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शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

अभय त्रिपाठी जी के कविता संग्रह - दुसरका खण्ड

अभय त्रिपाठी

(बनारस, उत्तर प्रदेश)

रामजी के आईल बरात  

 रामजी के आईल बरात जनकपुर बाजे बधऽईया,
उनकर लीला बा अपरम्पार जनकपुर बाजे बधऽइया.

राजा जनकजी के चिन्ता हरले, सियाजी के मनवा के मनसा पुरवले.
सब भईयन के कइले बेड़ा पार जनकपुर बाजे बधऽईया.
रामजी के आईल बरात..........

सब नर-नारी पशु-पक्षी प्रानी, हरषि हरषि गुन गावत जानी.
रिषी मुनियन से मिलल आशीर्वाद जनकपुर बाजे बधऽईया.
रामजी के आईल बरात..........

सगरे जनकपुर के राजदुलारी, हो गईली प्रभु राम के प्यारी.
उनकर डोली चलल ससुराल जनकपुर बाजे बधऽईया.
रामजी के आईल बरात..........

रामजी के आईल बरात जनकपुर बाजे बधऽईया,
उनकर लीला बा अपरम्पार जनकपुर बाजे बधऽइया.
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मगन भइल मनवा


मगन भइल मनवा हरि गुन गाइब,
मगन भइल मनवा ...........

गंगा नहाईब ना तीरथ जाइब घरवे में हम अलख जगाईब,
दान पुण्य कऽ विधि ना जानी सब कुछ आपन देहि लुटाईब.
मगन भइल मनवा ...........

छल प्रपन्च से नाता तोड़ब अपना पराया भेद मिटाईब,
सब कर बड़ा पार लगाईब सबही के अपनाईब हो रामा.
मगन भइल मनवा ...........

मन्दिर मस्जिद में ना भुलाईब राम रहीम सब एकही मानिब,
सच्चाई के गला लगाईब सगरे दर्शन पाईब हो रामा.
मगन भइल मनवा ...........

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भजन कर जिभिया.


भजन कर जिभिया काहे बऊरानी भजन कर जिभिया.

यह जग थोडे़ दिन कऽऽ बसेरा, रिश्ता नाता सुख सपना कऽऽ,
भ्रम टूटे बिलगानी भजन कर जिभिया काहे बऊरानी .

बालकपन में खेल में भागे बृद्ध भये तन काँपन लागे,
का करिहो अभिमानी भजन कर जिभिया काहे बऊरानी .

दिन दिन बितल जाये उमरिया समय गुजरले कुछ होईऽ न गोइयाँ,
सिर धुन धुन पछतानी भजन कर जिभिया काहे बऊरानी .

एक से बढ़कर एक गुमानी जात पात में डूबल ग्यानी,
समरथ भये अलसानी भजन कर जिभिया काहे बऊरानी .

भजन कर जिभिया काहे बऊरानी भजन कर जिभिया .
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माया बा दुखदाई हो मनवा


माया बा दुखदाई हो मनवा माया बा दुखदाई,
एहि पल छीना ओहि पल दीना सदा रहे उलझाई
माया बा दुखदाई हो मनवा माया बा दुखदाई.

घर में बन में मन मन्दिर में बइऽठ के धाक जमाई,
के बा आपन के बा पराया भेद दिहि बतलाई.
माया बा दुखदाई हो मनवा माया बा दुखदाई.

बिटवा माई और बाबु से बहुते फूट कराई,
सात जनम कऽ रिश्ता भी बहुते रार मचाई.
माया बा दुखदाई हो मनवा माया बा दुखदाई.

ना कोई ले आइल बा भइया ना कोई ले जाई,
एहि से ध्यान हटा के भइया कर लऽऽ तू चतुराई.
माया बा दुखदाई हो मनवा माया बा दुखदाई.
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सच बा गुरु के बचनिया


सच बा गुरु के बचनिया हो रामा जगतिया में केहु नाही अपना,
केहु नाही अपना हो सब कुछ सपना जगतिया में केहु नाही अपना.

काम नाही अइहैं धन दौलतिया ना होइहैं कोइ संगी संघतिया,
सूर, रहीम गइलैं मीरा जइसन ग्यनिया छोड़ि छोड़ि आपन निशनियाँ.
जगतिया में केहु नाही अपना.

तोहके नचावेले माया के पुतरिया ग्यान पर चलावे सगरे कटरिया,
अबहु ले सोच भइया धर के धयनवा हो जइहैं तब तोहरो ठेकनवा.
जगतिया में केहु नाही अपना.

एक दिन उड़ी जइहैं काया के सगनवा केतनो तू करबऽऽ जतनवा,
भाई बन्धु सब देखइहन नयनवा माया मिली न राम ए भइया.
जगतिया में केहु नाही अपना.

सच बा गुरु के बचनिया हो रामा जगतिया में केहु नाही अपना,
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इक दिनवा पछतऽईबऽऽ हो मोरे मनवा


इक दिनवा पछतऽईबऽऽ हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

भाई बन्धु हो जइहें बेगनवा,
जरिहें अकेले तोहरो परनवा.
माटी में मिल जइबऽऽ हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

धन दौलत और छूटी भवनवाँ,
जेहि खातिर हो गईलऽऽ बेइमनवा.
कुछुओ ना रह जाई हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

लागी दरबार होखी तोहरो बयनवा,
का कहबऽऽ जब खाली बा खजनवा.
लोरऽवा खूब चूअइऽब हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

दीनन हीनन से न राख तू गमनवा,
तोहपे लगईऽऽहैं वार तोहरे ईमनवा.
फिर पछताई के का करबऽऽ हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

इक दिनवा पछतऽईबऽऽ हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.
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दशरथ के ललन रऊआ धन बानी


धन बानी धन बानी धन बानी
दशरथ के ललन रउआ धन बानी.

बक्सर जाइके ताडका मरली
रिषी मुनियन के यज्ञ करवलीं
गौतम नारी अहिल्या के तरले बानी
दशरथ के ललन रउआ धन बानी.

जाइ जनकपुर शिव धनुष के तोडली
परशुराम के मान गिरवली
सियाजी के मनसा पुरवले बानी
दशरथ के ललन रउआ धन बानी.
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फगुनवा रास ना आवे


पियवा गइले परदेश फगुनवा रास ना आवे,
ना भेजले कउनो संदेश फगुनवा रास ना आवे।।

ननदी सतावे देवरा सतावे,
रही रही के जुल्मी के याद सतावे।
सासुजी देहली आशीष फगुनवा रास ना आवे।।

सखिया ना भावे नैहर ना भावे,
गोतीया के बोली जइसे आरी चलावे।
नींदियो ना आवे विशेष फगुनवा रास ना आवे।।

बैरी जियरवा कइसो ना माने,
रहि रहि नैना से लोरऽवा चुआवे
काहे नेहिया लगवनी प्राणेश फगुनवा रास ना आवे।।

पियवा गइले परदेश फगुनवा रास ना आवे,
ना भेजले कउनो संदेश फगुनवा रास ना आवे।।
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प्रीत करे मीत के पुकार हे सजनी


प्रीत करे मीत के पुकार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।।

दिहल केवरिया पवनवा खोलावे बरबस बेदर्दी के याद ले आवे,
रोय भरे सोरहो सिंगार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।
प्रीत करे मीत के पुकार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।।

छिटके चंदनिया अऽगीनिया लगावे सुतलस नेहिया इऽ बैरिन जगावे,
भावे ना अङ्गना दुआर हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।
प्रीत करे मीत के पुकार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।।

पिहके पपिहरा पनघट किनारे अपनी मोरनिया का मोरवा दुलारे,
सम्हरे न गगरी हमार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।
प्रीत करे मीत के पुकार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।।

सगरो फुलवरिया के फुलवा फुलाईल बन मतवारे भवरवा लोभाऽईल,
सहलो ना जाला बहार हे सजनी डासर सेजरिया जहर भऽईल।
प्रीत करे मीत के पुकार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।।

सरसो से खेतवा पियराइल बिरहन कोयलिया के बिरहा उमड़ाइल,
नीर झरे साँझ भीनसार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।
प्रीत करे मीत के पुकार हे सजनी डासल सेजरिया जहर भऽइल।।

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बलम हमके टीवी मँगा दऽ


फिर आईल किरकिटिया बुखार बलम हमके टीवी मँगा दऽ,
नाही करबे हम कउनो सिंगार बलम हमके टीवी मँगा दऽ।।

वर्ल्ड कप हवे एकर अंगरेजी नाम,
नाही करबे हम कउनो काम धाम।
काम आई ना कउनो जुगाड़ बलम हमके टीवी मँगा दऽ।।

चार बरिस में एक बारि आई,
सारे देशवा पर नशा छा जाई।
जगतिया में फैलल ईऽ छुतिया बवाल बलम हमके टीवी मँगा दऽ।।

सचिन तेन्दुलकर अऊर रिकी पोटिंग,
युवराज अउर सहवाग के होइ जाई सेटिंग।
चौका छक्का के हो जाई बऊछार बलम हमके टीवी मँगा दऽ।।

वेस्टइंडीज के द्वीपन पर लग जाई मेला,
सोलह देशन के खिलाड़ी देखइहैं आपन खेला।
इंडिया पर लागल बड़ा दाँव बलम हमके टीवी मँगा दऽ।।

किरकिट ही खईऽबे किरकिट ही पहिनबे,
इंडिया के जीतला पर जलसा मनईबे।
रसोई से हो जाई महिना भर के लीव बलम हमके टीवी मँगा दऽ।।

फिर आईल किरकिटिया बुखार बलम हमके टीवी मँगा दऽ,
नाही करबे हम कउनो सिंगार बलम हमके टीवी मँगा दऽ।।
.............

मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी


डोले फगुनऽईया जब डार पात लहरी,
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
 
कुहुके कोयलिया तऽ पीरा होय गहरी,
अन्हियारे पिपरा पकड़िया जब झहरी।
फरल फुलायल सब गोयड़े कऽ रहरी,
भिनसारे महुआ से महुआ जब झहरी।
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
 
संघिया के मार से प्रति नित कहरी,
मटक चले गोरी जब ताल व नहरी।
बिरहन सताये जब बसंत के प्रहरी
असुँअन छिपाये खातिर करे बरजोरी।
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
 
फूलन पर भँवरा के झुण्ड आ ठहरी,
सबके घर अइलन जब परदेशी शहरी।
छलकल बिरह रस नैनन की डहरी,
शिकवा शिकायत के लागल कचहरी।
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
 
डोले फगुनऽईया जब डार पात लहरी,
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
...........

बदरा घुरि घुरि आवे अँगनवा में


बदरा घुरि घुरि आवे अँगनवाँ में नींद नाहि आवे भवनवाँ में।।
 
मनके महल में सूधिया के पहरा प्रीत के हिड़ोले बिरहल लहरा,
दिल तार तार होला सपनवाँ में नींद नाहि आवे भवनवाँ में।।
 
आस के डरिया में आँख अझुराइल मोह से आपन लोरवा टकाइल,
केहु लुक छिप जाला परनवाँ में नींद नाहि आवे भवनवाँ में।।
 
नोचे खसोटेले रात सुधराई कोसे मसोसेले मारवान मिताई,
तनि आड़ घाँट बोधे बिहनवा में नींद नाहि आवे भवनवाँ में।।
 
बैरिन बयरिया डोले बल खाय के कंगना पयलिया बोले इठलाय के,
चैन आवे न बैरी सँवनवा में नींद नाहि आवे भवनवाँ में।।
 
बदरा घुरि घुरि आवे अँगनवाँ में नींद नाहि आवे भवनवाँ में।।
............

ई कइसन जिनगी के खेला


ई कइसन जिनगी के खेला ई कइसन जिनगी के मेला,
ना कोई कुछ ले आईल बा ना ले जाई एगुड़ो धेला।।
 
काल करावे खेला लेकिन भूल गईल सब आपन बेला,
खून के होली खेल रहल बा स्वार्थ भरल दुनिया के रेला।
ई कइसन जिनगी के खेला........।।
 
भाई के भाई दुश्मन भईल बा न नाही बाचल कउनो थैला,
नारी ही नारी के काटत जिसम हो गईल ओकरो मैला।
ई कइसन जिनगी के खेला........।।
 
इंसानन के बीच में भगवन ई कइसन हैवानी खेला,
मात खा गईल जानवर जानी बचल रह गईल ठेलम ठेला।
ई कइसन जिनगी के खेला........।।
 
कलयुग कहके केतना खेलब आपन ई माया के खेला,
खतम हो रहल दुनिया बा प्रभु अब त खोलीं आपन थैला।
ई कइसन जिनगी के खेला........।।
 
ई कइसन जिनगी के खेला ई कइसन जिनगी के मेला,
ना कोई कुछ ले आईल बा ना ले जाई एगुड़ो धेला।।
..........

कइसन-कइसन जिनगी


का का कहीं कइसे चुप रहीं हम हर कदम पर सवाल करेला जिनगी,
जिनगी खुद एक सवाल बन गईल देख के कइसन कइसन जिनगी।।
 
माई के दूध खातिर बचवन लोग के अफनात जिनगी,
दस रूपया खातिर सौ रुपया के गोली खात जिनगी।
हर मौके पर लाचारन के लूऽटत खसोटत जिनगी,
पापी पेट खातिर आपन जिसम लुटावत जिनगी।
जिनगी खुद एक सवाल.....।।
 
जिनगी के खेला में दुसरा के जिनगी लुटावट जिनगी,
माई-बाबू के सेवा के बदला कुकुरन के घुमावत जिनगी।
सन्यास लेहला के बाद भी विलासिता से भरपूर जिनगी,
जवन चीज आपन ना बा ओ खातिर खून बहावत जिनगी।
जिनगी खुद एक सवाल.....।।
 
रिश्तन के टूटत सिमेन्ट से आपन गृहस्थी बसावत जिनगी,
नेतावन के मतलब परस्ती से जनता के बेहाल भईल जिनगी।
दुसरा के माल पर राजा बने कऽ ख्वाव देखत भईल जिनगी,
जवन डाल पर इंसान बऽईठल बा ओही डाल के काटत जिनगी।
जिनगी खुद एक सवाल.....।।
 
का का कहीं कइसे चुप रहीं हम हर कदम पर सवाल करेला जिनगी,
जिनगी खुद एक सवाल बन गईल देख के कइसन कइसन जिनगी।।
.............

गीत कहीं या गजल


गीत कहीं या गजल सब एहि में कहाईल बा,
आपन बर्बादी के हाल सब एहि में कहाईल बा।।
 
पढ़े के उमरिया में किरकिटिया खेलाईल बा,
एक से एक मँहग बल्ला किनाईल बा।
आज उहे बल्ला से हमार कपड़ा धुलाईल बा,
हमरा पहिला शौक के धुआँ धुआँ उड़ाईल बा।।
गीत कहीं या गजल..........।।
 
बाबुजी के कहना ना एगुड़ो सुनाईल बा,
लागल हमके फिल्मी रोग ईऽ कहाईल बा।
हर लड़की में हमरा हिरोईनी देखाईल बा,
हर सपना हमार टुटके बिखराईल बा।।
गीत कहीं या गजल..........।।
 
कमाई के बेला तऽ बस हाथे मलाईल बा,
इन्टरव्यु में कलकत्ता के मुबंई सुझाईल बा।
सिफारिश के बिना बस किस्मतिया कोसाईल बा,
चुग गइला खेत के बाद ही दुनिया पछताईल बा।।
गीत कहीं या गजल..........।।
 
आपन हाल देखके ही एगो सीख याद आईल बा,
जिनगी के खेल में हुनर ही सबसे बड़ मिसाईल बा,
ई कहनी तऽ आपन बाटे राउर खीस काहे निपोराईल बा,
अइसन त नईखे ई रचना में रऊओ कहनी दोहराईल बा।।
गीत कहीं या गजल..........।।
 
गीत कहीं या गजल सब एहि में कहाईल बा,
आपन बर्बादी के हाल सब एहि में कहाईल बा।।
...........

महँगी महँगी रटिया भइया


महँगी महँगी रटिया भइया महँगी महँगी रटिया।
सबै जगह अधिकार हौ एकर काशी हो या रशिया,
महँगी महँगी रटिया भइया महँगी महँगी रटिया।।
 
छोड़ऽऽ मन्दिर मस्जिद जाये नाहक जिन तु भटकिया,
रटते जइया सदा ए भइया कहीं न जिन तू अटकिया।
अगर से कोई जे तोहके छेड़े ओके तुरन्त झटकिया,
महँगी महँगी रटिया भइया महँगी महँगी रटिया।।
 
सोते जगते खाते पीते एकरा संग ही लिपटिया,
करिहऽऽ अब परचार एहि कऽऽ एहि के संग मटकिया।
सस्ती कहीं से ताक लगावे ओके तुरन्त पटकिया,
महँगी महँगी रटिया भइया महँगी महँगी रटिया।।
 
करला जहाँ विरोध ए भइया होईहे खूब पिटइया,
पड़ जाइ फाँसी औ जग में होइ नाम घिसइया।
सुख पइबा इहि में अब से इकरे नाम गटकिया,
महँगी महँगी रटिया भइया महँगी महँगी रटिया।।
 
अच्छाई जे मन में आवे मन ही मन में सटकिया,
उपदेशक जिन बनिहा कबहु राह न एकरे फटकिया।
भूल के आपन दीन धरम अब सबकर माल कपटिया,
महँगी महँगी रटिया भइया महँगी महँगी रटिया।।
..............

हमार सलाम बा


विश्व के सभै भाई बन्धुअन के हमार सलाम बा.
सबकर आपस के झगड़ा मिटावल हमार काम बा.

हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई सबके अपना पर गुमान बा.
इंसान कहइला कातिर वसुधैव कुटुम्बकम हमार मुकाम बा.

का पंडित का मौलवी अउर का फादर के ई मान बा?
पंचत्तव के मंदिर में सबकर अन्त समान बा.

काल करेब सो आज हौ कर लीं, अभयजी के इ कहनाम बा.
प्यार के खातिर समये नइके, फिर काहे के अभिमान बा
.............

बबुआजी हाईटेक भईलें


शहर में जाके गाँव के चोला उतार के दिहले फेंक
पढ़ लिख कर बबुआजी हमार, हो गइलें हाईटेक.

जवना धूल में बचपन बीतल, वोही धूल में वाइरस आइल.
बाबूजी का थिंकपैड में जेनरेशनगैप के साफ्टवेयर समाइल.
खेत सिवान का चर्चा से पहिले, आपन मेमोरी दिहलें फेंक.
पढ़ लिख कर बबुआजी हमार, हो गइलें हाईटेक.

संस्कारी दुलहिन के बदला लवमैरिज के विन्डो खोलाइल.
हमरा खातिर का कईलीं कह, बँटवारा के बनवलें फाइल.
हर रियेक्शन प एन्टीरियेक्शन के फार्मूला नाहीं कइले चेक,
पढ़ लिख कर बबुआजी हमार, हो गइलें हाईटेक.

देशी सिस्टम के गारी देके एनआरआई के पेनड्राइव बनाईल.
विदेशी रुपिया के सूद का खातिर देशी बैँक के मेल भेजाइल.
स्वार्थ के हार्डडिस्क में फुल मेमोरी पर स्वार्थ के रोटी दिहले सेंक
पढ़ लिख कर बबुआजी हमार, हो गइलें हाईटेक.
............

नया रूप में कबीर वाणी


आईं सबही कोई मिल के एगो अलख जगावल जाय..
नया रूप में कबीर वाणी दुनिया के बतलावल जाय..

साफ सफाई के नारा ले के जग में ढ़ोल बजावल जाय..
जहाँ जहाँ पर मइल देखाए ओकरा मार भगावल जाय..
नया रूप में......

हक के माँग से पहिले सबके कर्तव्य याद करावल जाय..
विदेशीयन के विरोध से पहिले आपन नंगई हटावल जाय..
नया रूप में......

वेलेंटाइन डे के विरोध सही बा पर ई बात बताईल जाय..
बर बारात में नारी के नाचल कइसे सही जताईल जाय..
नया रूप में......

जाति पाति खेल निराला एकरा के बन्द करावल जाय..
एक कहे तऽ नौकरी दुसरा के काहे जेल भेजावल जाय..
नया रूप में......

महँगाई भ्रष्टाचार के आड़ में राजा के गरियावल जाय..
एकरा आड़ में खून चुसे वाला के काहे जोंक बनावल जाय..
नया रूप में......

आईं सबही कोई मिल के एगो अलख जगावल जाय..
नया रूप में कबीर वाणी दुनिया के बतलावल जाय..
............

केहू जल के बुझाला केहू....


हमरा कहला में भी एगो बात बा..
मानी ना मानी दुनिया एगो बिसात बा..
हमार खुशी देख के उनकर जियरा जरात बा..
उनकरा का मालूम कि हमार का का पिरात बा.
इधर दिन निकलेला उधर रात के अंधियारी.
उनकर बेवफाई पर हमार कलेजा तारतार होला.
दिया और फतिंगा में फर्क बा सिर्फ इतना..
केहू जल के बुझाला केहू बूझ के जराला..
.............

रिमझिम पड़ेला फुहार


रिमझिम पड़ेला फुहार हो देहियाँ में आग लगाये.
कइसे बचाई आपन जान हो देहियाँ में आग लगाये.

जबसे बलम जी परदेश गइलन, हमारे जियरवा के सुधि नाही लिहलन.
सासु जी के बोलिया में आग हो देहियाँ के आग लगाये..
रिमझिम पड़ेला फुहार हो...........

करेजवा के चीर जाला सहेलियन के बोलिया जरको ना सहाला उनकर ठिठोलिया
कइसे बुझाई आपन प्यास हो देहियाँ में आग लगाये.
रिमझिम पड़ेला फुहार हो...........

भेजतानी संदेसा हम अपना जूनून से सियाही ना समझीय लिखातानी खून से..
जियरा में नाही बाचल आस हो देहियाँ में आग लगाये.
रिमझिम पड़ेला फुहार हो...........

रिमझिम पड़ेला फुहार हो देहियाँ में आग लगाये..
कइसे बचाई आपन जान हो देहियाँ में आग लगाये.
...............
 

वारिस खातिर लइका चाहीं


वारिस खातिर लइका चाहीं मचल बा हाहाकार.
कोखी से ही लइकी साथे हो रहल बा भेदाचार.
हो रहल बा भेदाचार कि सुन लीं लइकन के करनी.
एगुड़े कोठरी में पेटवा काट के चार चार के पलनी.
कहे अभय कविराय कि अब आईल बा जमाना.
चार चार कोठरी के किला में भी ना माँ बाप के ठिकाना.
बोई ब पेड़ बबूल के त आम कान्हा से पई ब.
मार के लइकी के तू लइका कहाँ ले जई ब.
............

कलयुग के फेरा में भईया


कलयुग के फेरा में भईया सगरे जहर बुताइल बा.
कइसे बताईं पापी देहियाँ कहाँ कहाँ अझुराइल बा..

हमके पाले में बाबू के का का कष्ट झेलाईल बा..
पढ़ लिख के सबसे पहिले ही उनके लात मराईल बा.
कइसे बताईं पापी देहियाँ........

एगो कमरा में चार चार के पलले एमा उनकर बड़ाई बा.
हमरा चार चार कमरा में भी उनकर नही समाई बा..
कइसे बताईं पापी देहियाँ........

उनकर दौलत हमार दौलत हमार त हमरे कहाइल बा.
मेहरारू के अईते भईया घर के चुल्हा बटाईल बा..
कइसे बताईं पापी देहियाँ........

वइसे ई बुराई में भी एगो सकारात्मक सोच देखाईल बा..
का गरीब अउर का अमीर सब एकही राग चिल्लाईल बा..
कइसे बताईं पापी देहियाँ........

ई कहनी त घर घर के बाटे बाहर भी त रास रचाईल बा..
कामकाज में तरक्की खातिर मेहरारू पर दाँव लगाईल बा..
कइसे बताईं पापी देहियाँ........

मानतानी ई खेला में केहु केहु ही जोताईल बा
पर अइसन मौका भी भईया सबके कहाँ भेटाईल बा..
कइसे बताईं पापी देहियाँ........

प्यार मोहब्बत के खेला में मेहरारू के अदला बदली होखाईल बा..
जो खेले ऊ मॉडर्न बकिया के बैकवर्ड के तमगा दिलाईल बा.
कइसे बताईं पापी देहियाँ........

कलयुग के फेरा में भईया सगरे जहर बुताइल बा.
कइसे बताईं पापी देहियाँ कहाँ कहाँ अझुराइल बा..
............
 

पान खियाइके लूट लिहल हमके..


पान खियाइके लूट लिहल हमके..
कहे करेजवा तान के..
ए गोरिया रपट लिखा दऽ हमार..
अरे ए गोरिया रपट लिखा द हमार..

रपट लिखावे थाने गईलीं..
निकलल थानेदार हो..
जरा ईऽ तऽ कहा..
रपट लिखाईं कहाँ..
अरे ए थानेदार रपट लिखाईं कहाँ..
खुल के बता दऽ ओ रसिया..
रपट लिखाईं कहाँ..

जालिम जवानी दुश्मन हो गईल..
हो गईल अपना जान के..
जरा ईऽ तऽ कहा..
रपट लिखाईं कहाँ..

बरसेला बदरा भींगेला देहियाँ..
देखेला कनछी मार के
जरा ई त कहा..
रपट लिखाईं कहाँ..

पान खियाइके लूट लिहल हमके..
कहे करेजवा तान के..
ए गोरिया रपट लिखा दऽ हमार..
अरे ए गोरिया रपट लिखा द हमार..
...............

ना चहला पर भी जिन्दगी नरक बन जाई.


ना चहला पर भी जिन्दगी नरक बन जाई.
ईऽ आपन दिल हव जइसन चाहेब हो जाई.

बुजुर्गन के नसीहत भुलाईब जिन्दगी फूँक हो जाई.
मेहरारु के बकबकाईल भी कोयल के कूक हो जाई.
जिन्दगी रहे खातिर खाईब दू रोटी में पेट भर जाई.
किसमतिया के कोसत रहब तऽ अबरो खेत चर जाई.
ना चहला पर भी.

दूर के ढ़ोल सुहावन सोचब जिन्दगी खुशगवार हो जाई.
आसमान पर थुकला से खुद पर पलटवार हो जाई.
जोर जोर चिल्लइला से झूठ, साँच ना हो जाई.
समय अइला पर बरगद भी खाक में मिल जाई.
ना चहला पर भी.

दुसरा के गरिऔला से कुछुओ ना मिल जाई.
कुआँ पर गईला से सब प्यास मिट पाई.
हम ही हम बानी सोचब जिन्दगी उजड़ जाई.
एक बार मर के तऽ देखीं स्वरग मिल जाई.
ना चहला पर भी.

ना चहला पर भी जिन्दगी नरक बन जाई.
ईऽ आपन दिल हव जइसन चाहेब हो जाई.
..................

अभय जी के ई सब रचना पुरनका अंजोरिया पर बरीस 2010 से पहिले अंजोर भइल रहली सँ. अबहीं बहुते रचना बाकी बा. गँवे-गँवे जोड़ा पाई. आवत रहीं.



मंगलवार, 15 जुलाई 2025

अभय त्रिपाठी जी के कविता संग्रह - पहिला खण्ड

अभय त्रिपाठी

बनारस, उत्तर प्रदेश

त का करीं ?

चहलीं तऽ बहुत कि खुश रहीँ हम,
लेकिन दिल ही दगा दे गइल त का करीं ?
लगावे चलनी खूबसूरत बाग.
लेकिन माली ही उजाड़ दिहलसि तऽ हम का करीं ?
वक्त के आँधी बड़ा बेदर्दी बा,
जब नाखुदा ही डूबा दे तऽ हम का करीं ?
दिल तऽ आखिर दिल ही बा,
जब टूट ही गइल तऽ हम का करीं ?
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सबसे बड़ा रुपइया

रिश्ता नाता भूल गइल सब, रुपया अपरमपार,
रुपया अपरमपार, कमाये जब हम गईऽलीं,
धरम करम सब भूल के भइया, बन गइलीं सरकार,
बन गइलीं सरकार, के सबकर भाई कहइलीं,
रुपया के फेरा में, आपन दीन ईमान गवइलीं,
कहै अभय कविराय कि जग के एक ही मइया,
दि होल थिंग इज दैट कि भइया सबसे बड़ा रुपइया.
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डोले बसन्ती बयार


डोले बसन्ती बयार मगन मन होला हमार।

गेहुँआ ‍‍‍‍‍‍‍मँटरिया से लहरल सिवनवा,
होखे निहाल भइया सगरो किसनवा.
धरती के बाढ़ल श्रृंगार, मगन मन होला हमार।।

डोले बसन्ती बयार मगन मन होला हमार।

बिहँसेला फुलवा, महकेला क्यारी,
ताक झाँक भँवरा लगावे फुलवारी.
मौसम में आइल बहार, मगन मन होला हमार।।

डोले बसन्ती बयार मगन मन होला हमार।

आईल कोयलिया अमवाँ के डरिया,
पीयर चुनरिया पहिरे सवरियाँ
सोहेला पनघट किनार, मगन मन होला हमार।।

डोले बसन्ती बयार मगन मन होला हमार।
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आजा आजा ए भोला हमार नगरी


आजा आजा ए भोला हमार नगरी,
तोहरा भंगिया खियाईब भरी गगरी।।

पाप पुण्य के हाट लगल बा,
केहु राजा केहु रंक बनल बा।
नाही चाही एमा हमके तऽ कइनो गठरी
आजा आजा ए भोला हमार नगरी....।।

सच्चाई दम तोड़ रहल बा,
झूठ के डमरू बाज रहल बा।
आऽईल कलजुग के घनघोर बदरी,
आजा आजा ए भोला हमार नगरी.....।।

लोक लाज सब छूट गईल बा,
भ्रष्टाचार के अलख जगल बा।
नाही अईब तऽ लुट जाई काशी नगरी,
आजा आजा ए भोला हमार नगरी...।।

दर्शन दुर्लभ ताज भईल बा,
सरकारी कारागार भईल बा।
नाही जईबे हम कबहु तोहार डगरी,
आजा आजा ए भोला हमार नगरी...।।

आजा आजा ए भोला हमार नगरी,
तोहरा भंगिया खियाईब भरी गगरी।।
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वाह रे करम वाह रे धरम

मोह माया के त्याग के भईया ले लिहले सन्यास,
लेकिन जियरा ललचे लागल तोड़ दिहले बनवास।
तोड़ दिहले बनवास बन गईले सबकर नेता प्यारा,
ले आईब राम राज कऽऽ दिहले जग मे नारा।
राम राज तऽऽ आईल नाही लेकिन जब ऊऽ गईले जेल,
मचा दिहले पूरे समाज में हिंसा के ठेलम ठेल।
कहे अभय कविराय कि भईया मत कर अईसन जुरम,
अति भईला पर सब चिल्लाई वाह रे करम वाह रे धरम।।
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जानवरन के मीटिंग

जानवरन के मीटिंग में भइया बस इहे मुद्दा उभर के आईल बा,
घर लुटईला के बाद हमनी के करम भी इंसानन में बटाईल बा।
सबकर दुखड़ा सुन के राजा शेर के आँख में पानी भर आईल बा,
कइल जाई जाँच होखी हक खातिर महासंग्राम के बिगुल बजाईल बा।।
जानवरन के मीटिंग में.................।।

सबका सहमति से एगो संविधान पर अंतिम मुहर लगाईल बा,
सबसे पहिला हमार दुखड़ा के राग ढ़ेचुँ ढ़ेचुँ में गवाईल बा।
बाल मजदूरी अऊर श्रमिक उत्पीड़न में हमार हक दबाईल बा,
ई सुनते ही घोड़ा खच्चर ऊँट के राग भी एहि में समाईल बा।।
जानवरन के मीटिंग में.................।।

लोमड़ी मौसी के हाल तऽ अऊरो बदतर बा के ओरहना आईल बा,
दुसरा के माल पर आपन पेट भरे कऽ हक नेतवन में बटाईल बा।
नेताजी के चर्चा सुनते ही गिरगिटिया लोगन के रंग भी बदलाईल बा,
उनकर रंग बदले कऽ एस्क्लुसिव अधिकार भी नेता लोग चुराईल बा।।
जानवरन के मीटिंग में.................।।

भाई से भाई लड़त देख कुकुरन के जात भी शरम से पनियाईल बा,
पतनशील समाज में इंसान के दरिंन्दगी से जानवर भी शरमाईल बा।
जहर उगीले के सर्प राज के महारथ पर भी पूरा पानी फेराईल बा,
नारी के कमसिन जीवन में नारी के जरिये ही जहर घोलाईल बा।।
जानवरन के मीटिंग में.................।।

इहे हाल रही तऽ हमार का होखी के नारा से पूरा हाल थर्राईल बा,
सबसे बुरा हाल के रोना त़ऽ भईया खुद राजा शेर से ही रोआईल बा।
बड़ बड़ हथियार से लैस चूहा जइसन आदमी के रक्षक शेर कहाईल बा,
राजा शेर के दुखड़ा सुन सब जानवरन के आँख में पानी भर आईल बा।।
जानवरन के मीटिंग में.................।।
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याद आवेला

अमवा के पेड़वा पर झुलुआ झुलैया के याद आवेला,
गरमी के दिनवा में नानी के गऊँआ के याद आवेला।।

धूल भरल ट्रेफिक में गऊँआ के टमटम के याद आवेला,
आफिस के खिचखिच में मस्ती भरल दिनवा के याद आवेला।
दोस्तन के झूठिया देख माई से झूठिया बोलल याद आवेला,
प्रदूषण भरल पनिया देख तलवा तलैया के याद आवेला।।
गरमी के दिनवा में.......।।

ब्रेड बटर के देखत ही मकुनी अऊर चोखा के याद आवेला,
कोल्ड ड्रिंक के केलोरी में छाछ और पन्ना के याद आवेला।
फास्ट फूडन के दुनिया में सतुआ-चबेना के याद आवेला,
अश्लील भईल सिनेमा से कठपुतली के नचवा के याद आवेला।।
गरमी के दिनवा में.......।।

बीबी के होटल बाजी से माई के खनवा के याद आवेला,
मतलबी पटीदारन में जानवर के वफादारी के ञाद आवेला।
दारुबाजन के हुड़दंगई में भंगिया के मस्ती के याद आवेला,
पुलिसियन के रौब देख रावण अहिरावण के याद आवेला।।
गरमी के दिनवा में.......।।

भ्रष्टाचारी के मनसा देख सुरसा के मुँहवा के याद आवेला,
नेताजी के करनी से गिरगिटया के रंग बदलल याद आवेला।
बेईमान भरल दुनिया में आपन बेईमानी के याद आवेला,
ना होए पुनर्जन्म अब तऽ बस अंतिम समइया के याद आवेला।।
गरमी के दिनवा में.......।।

अमवा के पेड़वा पर झुलुआ झुलैया के याद आवेला,
गरमी के दिनवा में नानी के गऊँआ के याद आवेला।।
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परलय काल

माया के फेरा में प्रानी, नित नित करे बवाल,
पुण्य धरम सब भूल गईल बा, पापी हो गईल काल।
पापी हो गईल काल, काल में बचल बा एक सवाल,
सवाल यहि अब आगे का बा, कइसे सुधरी ईऽ मायाजाल।
कहे अभय कविराय कि अब तऽ हो गईल जी के जंजाल,
करम जुटाईं आपन सबे कोई, अब तऽ आई परलय काल।।
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जिनगी सयान हो गईल


जिनगी सयान हो गईल जीना मोहाल हो गईल.......

रक्षक ही भक्षक बा अब तऽ कहना ईऽ जंजाल हो गईल,
परिवर्तन युग के नारा बा पर हमरा संग बवाल हो गईल।
कहलीं जब जुरमी के लेखा जिनगी एक सवाल हो गईल,
प्रेम प्यार के पाठ पढ़ावल सबसे बड़ा कमाल हो गईल ।।
जिनगी सयान हो गईल....................

आपन स्वारथ मिटावे खातिर अभिनेता किसान हो गईल,
संयासिन के ठाठ के आगे राजा रंक समान हो गईल।
माई बाबू के बदला अब कुकुर घुमावल आसान हो गईल,
भ्रष्टाचार के वैशाखी ले के मेरा भारत महान हो गईल।।
जिनगी सयान हो गईल....................

बाप न मारे मेंढ़की अऊर बेटा तीरंदाज हो गईल,
संस्कारी लोगन के आगे मुजरिम प्रधान समाज हो गईल।
जुरम करत पकड़ाते नेताजी के तबीयत नासाज हो गईल,
देखलवनी जब दुनिया के ऐना सब केहु नाराज हो गईल।।
जिनगी सयान हो गईल....................

जिनगी सयान हो गईल जीना मोहाल हो गईल.......
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कलयुगी माया के महिमा

कलयुगी माया के महिमा से सारी दुनिया दबाईल बा,
का ज्ञानी का अज्ञानी सब एहि माया में अझुराईल बा।
पढ़ब लिखब होखब नवाब कऽ नारा दुनिया से भुलाईल बा,
अब तऽ गोली तमंचा में ही दुनिया के अर्थ समाईल बा।
कलयुगी माया के महिमा.........

नेहरु गाँधी के आदर्श के नारा शिक्षक ही भुलाईल बा,
डाकू गु्ण्डन के सम्मान के खातिर विद्यापीठ अघाईल बा।
जेकर कउनो मान ही नइखे ओकरे मान मनाईल बा,
रिश्वत खाके भी नेताजी के बत्तीसा खीस निपोराईल बा।
कलयुगी माया के महिमा.........

प्रेम प्यार के फेरा में अब तऽ बिटिया से आँख लड़ाइल बा,
सजनी खातिर माई काटत जरको ना लोर चुआईल बा।
ईऽ कहनी तऽ अइसन बाटे खुद के आँख देखाईल बा,
का सोचीं हम एकरा आगे जब एहि से मनवा पटाईल बा।
कलयुगी माया के महिमा.........

अईसन भी नईखे बबुआ लोगिन दुनिया से प्रेम मिटाईल बा,
विध्वसं के बाद निर्माण भी होखी ई सपना देखाईल बा।
पूछब ऊपर नारायण से कि ई खेल से केकर दिल बहलाईल बा,
बन्द कर दीं अब कलयुग के खेला रऊए नाक कटाइल बा।।
कलयुगी माया के महिमा.........
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कुर्सी के महिमा

कुर्सी के महिमा ए भईया देखाऽ जबरदस्त,
जे पाये ऊ मस्त हो रामा जे ना पाये त्रस्त..

सबसे पहिले बुढ़वा कुर्सी कहलाए ऊऽ प्रेसीडेन्ट,
बुढ़वन खातिर फिक्स ए भईया एकर एग्रीमेन्ट.
ना कउनो विवाद भईल बा ना बदनामी के चर्चा,
नम्बर वन के कुर्सी ईऽ बा जाने बऽच्चा बऽच्चा.
ई कुर्सी के छोड़ के बाकी कुर्सी बाऽ मदमस्त,
जे पाये ऊ मस्त हो रामा जे ना पाये त्रस्त..

पीएम सीएम सांसद भईया जाने सब कुर्सी के महिमा,
कुर्सी के पावे खातिर ख्याल न रऽखे कउनो गरिमा.
प्रजातन्त्र के नारा दे के कुर्सी के दू फाड़ कईऽल बा,
का साधू का मुजरिम भईया सबकर इऽहै जात बनल बा.
सत्ता के कुर्सी के खातिर मुजरिम बन गईऽल सरपरस्त,
जे पाये ऊ मस्त हो रामा जे ना पाये त्रस्त..

कबहु रहऽल इन्द्र के कुर्सी बात बात पर डोले लागे,
जान जाये पर कुर्सी ना देब उनकर मनवा बोले लागे.
हमके तऽ ईऽ लागत भईया आपन आफत थोपे खातिर,
पृथ्वीलोक के रोग के पीछे देवलोक के ईऽ चाल बा शातिर.
अब ना डोले इन्द्र के कुर्सी षड़यन्त्र हो गईऽल जबरदस्त.
जे पाये ऊ मस्त हो रामा जे ना पाये त्रस्त..

कुर्सी के महिमा ए भईया देखाऽ जबरदस्त,
जे पाये ऊ मस्त हो रामा जे ना पाये त्रस्त..
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बाबू हमार बियाह कईऽले

हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले,
ज्ञान के चक्षु खुलते भईया हमरा लाइफ से बाहर गईऽले.

माई के सेवा हम कईऽलीं अऊऽर बाबू के गोड़ दबवलीं,
कबहुँ न ऊँचा बोली बोललीं ईऽ सब हम अज्ञान में कइऽलीं.
हमरा ज्ञान बढ़ावे खातिर बाबू एक प्रयोजन कईऽले,
सबकर राय मंत्रणा ले के हमरा खातिर लऽईकी देखले.
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले.

पत्नी आईल सुन्दर गोरी हमके बहुत बहुत ही भाईऽल,
हमरा ज्ञान के सीमा जनले मन ही मन बहुत पछताईऽल.
लोक लाज के शरम में आके पहिले तऽ चुपचाप रह गईऽल,
ओकरा जरिये सरऊऽ फिर हमरा मन पैठ जऽमईऽले.
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले.

मेहरारु के रंग में आके हमरे ज्ञान के चक्षु खुल गईऽल,
माई बाबू गौड़ भये अऊर मेहरारु सर्वोपरि हो गईऽल.
माई के सेवा के बदले मेहरारु कऽऽ नशा छा गईऽल,
सरऊ के चक्कर में आके बाबु अपना गोड़ से गईऽले.
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले.

माई बाबू से छुट्टी खातिर जल्दी से सब बियाह कऽईले,
का रखल बा माई बाबू में पत्नी के सम्पूर्ण समझऽले.
पीछे की छोड़ आगे की सुध ले नारा ई मन में तू जमईऽले,
बिटवा कबहु न पैदा करिऽहे वरना तू भी काम से गईऽले.
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले.
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मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह

ना कुछ कहिऽह ना कुछ बोलिऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.

सबके फिकर बा आपन आपन न्याय भईल अब सपना भईया,
गाँधी के सिद्धान्त गईल बा हिंसा ईंहा के राज भईल बा.
देख के ईऽ सब आँख ही मुदिंऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.

भारत माता रोअत बाड़ी कोख के अपना कोसत बाड़ी,
इक दुसरे के रोजी झपटल अन्याय के रथ पर भटकल.
दिल ही दिल में तू रखिऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.

अपने से दूबर के पटकल शान देखावत कभी ना अटकल,
मार काट तऽ अइसे कईऽलस इंतहान के परचा दिहलस.
करम के अपना तू रोईऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.

ना कुछ कहिऽह ना कुछ बोलिऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.
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बचवन देश गँवइऽऽह मत

बचवन देश गँवईऽऽह मत दुश्मन से घबड़ईऽऽह मत.

सब देशन से भारत अच्छा जेकर करे हिमालय रक्षा,
सागर करेला एकर रखवारी ललचाएला दुनिया सारी.
एके तू बिसरईऽऽह मत बचवन देश गँवईऽऽह मत.

इहँवे भइलन कृष्ण कन्हैया आज भी बाटे गोकुल गइया,
इहँवे पर राम अवतरले जे रावण के मान घटवले.
इनके कलंक लगइऽऽह मत बचवन देश गँवईऽऽह मत.

अनेक योद्धा अनेक त्यागी अनेक योगी अऊर बैरागी,
परोपकारी अनेक दानी जेकर इहँवे बाऽऽ निशानी.
इनसे मुहँ चोरईऽऽह मत बचवन देश गँवईऽऽह मत.

जिम्मेदारी अब तोहार बा भारत माता के पुकार बा,
दुश्मन चारो ओर अड़ल बा भारत भेदियन से भरल बा.
इनसे तनिक डेरईऽऽह मत बचवन देश गँवईऽऽह मत.

कपट से कपटी पाकी अइलस खाके मात लजाई गईलस,
भुट्टो के तऽ यादे होई ढाका में जे गुजरल होई.
आपन शान घटईऽऽह मत बचवन देश गँवईऽऽह मत.

आज नीति डाँवाडोल बा स्वार्थ रूपी विष घोलल बा,
तबाही के पीड़ा भईया भोगे तोहार बाबा मइऽऽया.
तूऽऽ एके अपनईऽऽ मत बचवन देश गँवईऽऽह मत.

बड़कन के कुछ गलती होई बबुअन माख न रखिऽह कोई,
जैसे खाके आम के गुदा गुठली कर दिहल जाव जुदा.
सच्चाई झूठलईऽऽह मत बचवन देश गँवईऽऽह मत.

बचवन देश गँवईऽऽह मत दुश्मन से घबड़ईऽऽह मत.
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धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी

धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी
जेकरा दर्शन के तरसे जग के सगरो प्राणी प्राणी.

मूरख पंडित साधू अऊर ग्यानी राजा रंक अऊर अभिमानी,
केहु नाही बा अइसन भईया जे काशीके महिमा ना जानी.
पाप से मुक्ति पावे खातिर हर केहु आवेला काशी,
उनके बाऽ विश्वास कि जालन स्वर्ग में काशी के बाशी.
धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी.

काशी के महिमा कारण ग्रहन में आला अईसन भीर,
तिल धरे भर के जगह नाऽ बाचल गंगाजी के तीर.
बुढ़ा बच्चा अऊर जवान भेद भाव के छोड़ निशान,
दौड़ लगावे अइसे जइसे मिल गइले इनके भगवान .
धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी .

भीड़ भी लऽउके अइसन जइसे बाढ़ के उमड़ल पानी,
सच्ची सेवा के भावना में भूल गइल सब कुछ प्रानी.
नैया गंगाजी में दौड़ल लेके यात्री जन के पूरा भार,
जनसेवक उनके सेवा खातिर हरदम बा पूरा तैयार .
धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी.

घाट घाट पर शोर मचल सुन लीं साधू संतन के बोली,
दान धरम के महिमा सुना के उनकर भर गइल झोली.
गंगा किनारे और सड़क पर लागल ड्यूटि पुलिस के भाई,
इधर से आके उधर से जा जा जनता के बा रहल समझाई .
धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी .
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माई रे हम जेल जाइब

माई रे हम जेल जाइब कुछ अउर नाही तऽ नेता ही बन जाइब,
माई रे हम जेल जाइब.

बचपन में हम ध्यान ना दिहिलीं एक से बढ़के खेला हम कइलीं,
कसम खिया ले हमसे माई ईऽ गलती अब ना दोहराईब.
माई रे हम जेल जाइब.

पढ़ली लिखिलीं बीए पास केहु ना डललस हमके घास,
का करेब हम नौकरी करके ऐकौ धेला बचा ना पाइब.
माई रे हम जेल जाइब.

बाबू कहले धन्धा कइलीं सब चिजीया में मिलावट कइलीं,
हमरो भी ईमान धरम बा इहै बात तोहके समझाइब.
माई रे हम जेल जाइब.

नेता बनके नाम कमाइऽब नाम कमाइब दाम कमाइऽब,
जे ना मानी हमरा बात हम ओके मिट्टी में मिलाइब.
माई रे हम जेल जाइब.
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कलयुग के नेता.

जय कलयुग के नेता भ्राता, भ्रष्टाचार के तुम हो दाता.

जे तोहरी जी हुजुरी बजावे, सुख सुविधा वो सब कुछ पावे,
चोर गद्दार के तू रखवाला मिल भारत के करें दिवाला.
जय कलयुग के नेता भ्राता, भ्रष्टाचार के तुम हो दाता.

जेकरे द्वारे तू चला जावे धन्य धन्य ऊऽऽ जन कहलाई,
खद्दर से तन आपन सजाके कहलइल तू गाँधी के भाई.
जय कलयुग के नेता भ्राता, भ्रष्टाचार के तुम हो दाता.

जे तोहके धन पहुँचवलस लक्ष्मी ओकरे घर में गइलस,
जब आवे चुनाव के बारी पैदल चले लऽऽ छोड़ सवारी.
जय कलयुग के नेता भ्राता, भ्रष्टाचार के तुम हो दाता.

हाथ जोड़ के तु बतियाऽव मुरख जनता के फुसलाऽऽव,
जीत इलेक्शन घर तू बइऽऽठ बड़ ताव से मूँछ तू ऐंठऽ.
आपन तोहरे बाटे चिन्ता जय कलयुग के नेता भ्राता.

जय कलयुग के नेता भ्राता, भ्रष्टाचार के तुम हो दाता.
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मिलावट

मिलावट के मारे सबही के नाक में दम आइल बा,
केकरा केकरा के कहिं एमा सबहीं अझुराइल बा.

बात मे मिलावट विचार मे मिलावट
चाल में मिलावट खाल में मिलावट,
पोशाक में मिलावट के झण्डा फहराइल बा
केकरा केकरा के कहिं........

काम में मिलावट ध्यान में मिलावट
पति में मिलावट पत्नी में मिलावट,
मिलावट के भाई बहिन से सिनेमा होटल फुलाइल बा
केकरा केकरा के कहिं........

तौल में मिलावट कौल में मिलावट
चावल में मिलावट दाल में मिलावट,
आटा में मिलावट से दाँत किरकिराइल बा
केकरा केकरा के कहिं........

शक्क्कर में मिलावट शहद में मिलावट
मख्खन में मिलावट डालडा में मिलावट,
तेल में मिलावट से बाल अझुराइल बा
केकरा केकरा के कहिं........

कथनी में मिलावट करनी में मिलावट
घी में मिलावट और साग में मिलावट,
दवाई में मिलावट से मनुष्यता लजाइल बा
केकरा केकरा के कहिं........

कान में तेल डालके अधिकारी लोग बहिराईल बा,
थोड़ा बहुत खाके अपना कर्तव्य से भुलाइल बा.
कऊनो अइसन चीज नइखे जवन शुद्ध कहलाइल बा,
अगर कुछ शुद्ध बा त विदेश से मँगाइल बा.
रोवतारी भारत माता शुद्धता लुकाइल बा,
सरग जइसन देश आपन नरक में ढ़केलाइल बा.
पढ़के नाराज मत होखब सभै दुख से लिखाइल बा,
एक आदमी के कहात नइखे सबकर उगलाइल बा.
केकरा केकरा के कहिं........
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इन्द्र कऽ कुर्सी फिर से डोलल.


स्वर्ग में मचल बा हाहाकार सब केहु हो जा खबरदार,
का भईल कऽऽ शोर बा मचल इन्द्र कऽ कुर्सी फिर से डोलल.

का देवी देवता अऊर का देव गुरु सबही बा घबराईल
सबकर एक ही मंत्रणा आखिर ई आफत कहाँ से आइल,
केहु कऽ भी दिमाग नाही चलल इन्द्र कऽ कुर्सी फिर से डोलल.

काऽ होइ काऽ होइ के बीच यमराज कऽ इक दूत आइल
साथ में इक मृतआत्मा के देख सबकर दिमाग चकराईल,
सब देखे लागल एक दुसरा कऽऽ शकल इन्द्र कऽ कुर्सी फिर से डोलल.

बाअदब बामुलाहिजा़ होशियार कहके यमदूत सुनवले यम संदेश
एकरा चक्कर में नर्क में आइल आफत एहिसे ब्रह्माजी दिहले आदेश,
स्वर्ग में ही सत्ता कऽ हो सकेला बदल इन्द्र कऽ कुर्सी फिर से डोलल.

सत्ता के लालची नेता के देख ऊँहा मच गईल तहलका
अइसन स्थिति फिर ना आवे कोई उपाय करे के होई पक्का,
नया नियम के सिवा रास्ता ना बचल इन्द्र कऽ कुर्सी फिर से डोलल.

स्वर्ग और नर्क में कउनो भी नेता कऽ आवागमन हो गइल निषेध
अब मरते ही तुरन्त पुनर्जन्म देबे कऽ पारित हो गइल आदेश,
ना रहिहैं साँप ना होई लाठी कऽ दखल इन्द्र कऽ कुर्सी फिर से डोलल.
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सुखवा सपना भइल बा

सुखवा सपना भइल बा, ना जाने कँहवा गइल बा.

आडम्बर के मंच लगल बा, हाहाकार भाषण बनल बा.
शान्ति हो गइल उद्विग्न बा, धैर्य संतोष में आइल विध्न बा.
सुखवा सपना भइल बा, ना जाने कँहवा गइल बा.

सांत्वना सहानुभूति के बजर पडल बा, मिथ्या उपहास के तूती बा.
भरसाईं में जरल लाज शरम बा, फुहडता निर्लज्जता भइल धरम बा.
सुखवा सपना भइल बा, ना जाने कँहवा गइल बा.

छप्पर फार के बरसत कलेश बा, शिक्षा संस्कार के गिरल स्तर बा.
भालू बन्दर से वेत्ता लोग बदतर बा, यजिगर काया के सख्त अभाव बा.
सुखवा सपना भइल बा, ना जाने कँहवा गइल बा.

क्षुद्रता लालच के लगल आसन बा, भ्रष्टाचार करत शासन बा.
आदर सम्मान के लागल गोली बा, लड़का लोग बाबू के फोड़त माथा बा.
सुखवा सपना भइल बा, ना जाने कँहवा गइल बा.
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आयल मधुमास कोयलिया बोले

आयल मधुमास कोयलिया बोले .

लाल लाल सेमरु पलास बन फूले
सुमनो की क्यारी में भँवरा मन डोले,
किसलय किशोरी डारन संङ झूले
महुआ मगन हो गन्ध द्वार खोले.

आयल मधुमास कोयलिया बोले .

सुगन्धित पवन भइ चलल होले होले
ढोलक मंजिरा से गूँजल घर टोले,
रंग पिचकारी मिल करत किकोले
छनि छनि भंग सब बनल बमभोले.

आयल मधुमास कोयलिया बोले .

उड्ल गुलाल लाल भर भर झोले
मीत के एहसास बढल मन के हिडोले,
धरती आकाश सगरे प्रेम रस घोले
मख्खियन के झुण्ड पराग के टटोले.

आयल मधुमास कोयलिया बोले .
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पतई पर परान बा


पतई पर परान बा
सांसत में जान बा
मिथ्या जबान बा
धोका सम्मान बा
दौरी भर शान बा
शिक्षा शैतान बा
टुटहा अरमान बा
नाहक वरदान बा
ढोंगी महान बा
पीडा आसान बा
कौआ लेले कान बा
भेडिया धसान बा
मरयादा शमशान बा
सिर धुनत मान बा
दम तोडत ब्रतमान बा
केहु के न भान बा. 

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अभय जी के ई सब रचना पुरनका अंजोरिया पर बरीस 2010 से पहिले अंजोर भइल रहली सँ. अबहीं बहुते रचना बाकी बा. गँवे-गँवे जोड़ा पाई. आवत रहीं.

शनिवार, 12 जुलाई 2025

अशोक द्विवेदी जी के तीन गो कविता

अशोक द्विवेदी जी के तीन गो कविता अंजोरिया के पुरनका संस्करण पर अंजोर भइल रहल. आज ओहनी के अंजोरिया के नयका संस्करण पर अंजोर कइल गइल बा. गाँव के कहानी (1) गाँव के कहानी (2) गाँव के कहानी (3)