साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 13 जनवरी 2025

चटकन

 कहानी

चटकन

- बद्री विशाल मिश्र



‘ए बचवा तनी कँवाड़ी खोलऽ, बासो खोलऽ. ’


‘बढ़नी मारो.  चटकबो चाची के निनियो नइखे लागत. ’ - कहत बासो खटिया से उठली त बिहान हो गइल रहे.  अझुराइल आंचर सझुराके माथ पर ओढ़ते बासो जाइ के निकसार के केवाड़ी खोल देहली.  चटकबो चाची चउकठ से भीतर अइली त बासो उनुकर गोड़ छूके आशीरवाद लिहली. '‘चाची तू बईठऽ.  तले ले हम चउका बरतन कर लीं ’- कहत बासो चले चहली तबले केहू बहरी से आवाज दीहल - ‘केहू घर में है जी ?’

‘का हऽ ए दादा !’ बासो के करेजा धकदे कइ दिहलसि बाकि हाथ झारी के चलली त झन्न से हाथ के एगो चूड़ी टूटिके नीचे गिरी परल.

‘बढ़नी मारो, सबेरे सबेरे हाथ के चूड़ी फूटल. ’ - बासो चूड़ी के टूटान आगे देखत केवाड़ी के पल्ला हटवली त एगो सिपाही दुआरी पर ठाढ़ रहे.

‘का बाति हऽ. ’- भंउहा तक आंचर सरकावत बासो पूछली.

‘सोहागिन रहऽ रोजी बढ़ो. ’- कहत चटकबो चाची आंगन के ओसारा में रखल खाटी पर आके मठूस नियर बइठ गइली. सिपाही अपना कन्हा में से झोरा निकालि के बढ़ावत कहले - ‘ई झोरा पहिचानत बाड़ू ?’

चटकबो चाची आ बासो एकही नइहर के रहे लोग.  एहसे सांझि बिहाने जब मन उकताए चटकबो चाची बासो के घरे चलि आवस आ बोल बतिया के मन बहलावसु. ‘हं ’ - बासो कहली - ‘हमरे अदमी के झोरा ह.  हमरा हाथ के टांकल उनुकर नांव एहपर बा. ’

‘एगो बीड़ी धरा के दअ ए बचवा’- चटकबो चाची सूखल ओठ चबावत कहली- ‘इ लुफुति बड़ा बाउर बा. ’

‘देखीं ना, बीड़ी के बण्डल तऽ अपना संगही लेले गइल बाड़न. ’- बासो खड़े खड़े आंखि मीचत कहली.

चटकबो चाची मुसुकइली - ‘हं ए बचवा, ददन त कमाए नू गइल बाड़ें. ’

बासो चंउकली - ‘तहरा कइसे मालूम भइल हऽ ए चाची ? उ तऽ परसवें से गइल बाड़ें. ’

चटकबो चाची एक गोड़ नीचे रखली आ कहली -‘हमार छोटका नतिया नू बाजारी से आवत घरी ददन के देखुवे त गोड़ लगला पर ददने कहलें कि ऊ गोरखपुर नौकरी करे जात बाड़े .  तीन दिन से हमहूं बोखार से पटकाइल रहनी हऽ एहीसे तहरा किहां ना आ पवनी हऽ. ’


‘बाकि अू गुजरि गइलें’- झोरा बासो के हाथ में धरावत सिपाही कहलें - ‘लासि पहिचान में नइखे आवत.  थाना में जाइके शिनाख्त कइ लऽ. ’

‘कइसे मरले ए दादा ?’- कपार पीटत बासो भुईयां गिर परली.

सिपाही कहलें -‘छपरा जंक्शन का लगे दू गो टरेन लड़ि गइल हा.  हम चलत बानी, तू आके पहिचान कइ ल. ’

बासो के गिरत देखिके चटकबो चाची आपन कूबर हुचुकावत लगे पंहुचली आ बासो के अपना अंकवारी में उठाके समुझा बुझा के चुप करावे लगली.

ददन के मरल सुनते भरि गांव टूट पड़ल.  लेकिन केकरा अखतियार बा ददन के जिया देबे के ? एह से देखि समुझिके सभे केहू अपना अपना काम धन्धा में चलि गइल. दिन जात देरि ना लागे.  ददन के सराधो हो गइल.  हित नात सभे विदा लेके उदास मने अपना घरे गइल.  घर में अकेले रहि गइली बासो.  ऊ कहां जासु? उनुकर त पांख टूट गइल रहे.  उड़सु त कइसे उड़सु ?

एक दिन मन मारि के ओसारा में खाटि पर पड़ल रहली.  उनुकर नजरि खूंटि में टांगल ददन के झोरा पर पड़ि गइल.  उनुका हाथ से लाल डोरा से टांकल ददन के नांव आंखि में पड़ल आ बासो के मन अतीत में चलि गइल - ‘का बेजाइं रहे, जदि खेतिये करत रहते त?’

याद आइल बिआह के बिहान भइला बासो जब ससुरा अइली त ददन उनुका के अंकवारी में उनुका के बान्हि के पुचुकारत कहलें - ‘बासो हम त पढ़नी लिखनी ढेर बाकि बाबूजी के मरला का चलते खेती में आ जाये के पड़ल. माई त जनमते साथ छोड़ि दिहलसि.  लेकिन हम तहार साथ ना छोड़बि.  गिरहथिए में खटि कमाई के तहार साध पूरा करबि. ’
 

बासो मचलि के ददन का सीना में समा गइल रहली.  गाड़ी लीक पर चले लागल रहे. ददन खटिके आवसु त बासो एक लोटा पानी आ गुड़ का साथ मुसुकाई के उनकर सोआगत करसु.  अन्न धन घर में पूरा भरल रहे.

इनकर ठाटबाट देखिके चटकबो चाची के सोहाव ना.  काहे कि चाची के दूगो बेटा आ दूनो दू घाट.  एगो तीर घाट त एगो मीर घाट. एगो गंजेड़ी त दोसरका जुआड़ी.  बाप दादा के अरजल खेत बेंचि के गांजा आ जुआ में खतम क के एने ओने मारल फिरत रहले स.  बासो के चहक दहक चटकबो चाची के डाह के कारन बनल रहे.  एह से ददन के घर बिलवावे नेति से बासो के काने लगली.

‘आ हो बासो !’

‘का हऽ ए चाची ?’ -य बासो चाची के पंजरा बइठत बोलली.

‘ददन कहां बाड़े ?’- चाची मुंह सिकुरावत पूछली.  बासो गाल पर हाथ धइ के कहली -‘खेत घूमे नू गइल बाड़ें चाची.  गंहू बूंट के गदराइल छेमी कोमल कोमल बा.  झाोपड़ास खा जात बाड़ी सऽ. ’

‘त ढेले फोरत रहीहें किनोकरियो करिहें?’ चाची उसकवली - ‘अतना पढ़ लिखि के गंवार बनल बाड़ें ददन.  कहीं नोकरी करतन त नगदा पइसा नू भेंटाइत.  तूहूं चार पइसा के आदमी हो जइतू. ’

‘जाये दऽ चाची’ - बासो मुंह फेरत कहली - ‘ जवन करम भाग में लिखल रहेला उहे होला. ’

‘ई का कहलू बासो ?’- चाची आपन छाती पीटत कहली -‘तहार करम फूटि गइल बासो.  हम ई जनितीं कि ददन जिनिगी भर ढेले फोरे के ठेका ले लीहें तऽ हम ददन के बिआह के अगुअई ना कइले रहतीं. ’

बासो चाची के मुंह टुकुर टुकुर ताके लगली.  पांच साल पिछलहीं मरद मुअल चाची के उज्जर मांग निहारत बासो बिगड़ पड़ली - ‘इ कुल्हि बाति हमरा से मति सुनाव.  हमरा केथी के कमी बा ?’

चाची माया फइलवली.  डहकत कहली -‘सब कुछ त बड़ले बा बाकिर ददन के ना रहला पर का होई ? खेत बेचिये बेचि केे नू खाये पड़ी.  जइसे हमार बबुआ लोग करत बा.  ओहि लोग पर त हमार का अधिकार बा ? बाकिर तहरा के हरदम हृदया में धइले रहेनी एहसे दरद बा बचवा.

ददन सरकारी नोकरी करिहें त उनुका नाहियो रहला पर तहरा उनुकर पिनिसिन त मिली. ’

बासो के मन में चाची के बाति धसि गइल.  उचकि के कहली -‘तनी तूंही समुझाव ना चाची उनुका के.  हमार बाति उ एह खातिर ना सुनिहें. ’

‘ना ए बचवा’-चाची बुझि गइली कि तीर आज निसाना पर लाग गइल बा. बाकि आंखि चिआर के कहली -‘बचवा ऊ छनकि जइहें.  हम तहरा के उपाय बतावत बानी. ’

‘का ?’ - बासो सवाल कइली.

‘देखु बचवा’-चाची बासो के हाथ दबा के कहली -‘तेल ले आवसु त मोरी में ढरका दे, चाउर बनिया के दोकान पर बेच दे.  नाना परकार से उनुका के तंग करू.  जब तहरा कहला में आ जइहें तऽ नोकरी के प्रस्ताव करीहऽ.  उनुका त मजबूर होखहीं के बा. ’

बासो चाची के कहला मोताबिक कई महीना तक चीज बतुस नोकसान कइ कइ के ददन के बेहाल करत गइली.  एकदिन ददन खाये बइठलें त छूंछे रोटी परोसि दीहली.  पूछला पर कहली -‘हरवाह चरवाह के इहे नू खाना हऽ.  कमइतीं त जवन चहितीं खइतीं पियतीं.  रउआ हमरा जिनिगी पर कबहूं खेयाल ना कइनी.  देह पर एको थान गहना नइखे.  कबो शहर शहरात के मुंह ना देखनी.  हमार करम फुटि गइल जे अइसना घरे अइनी. ’

बासो के बात ददन के लागि गइल.  ऊ बासो के बनावल झोरा साजि पाथि के नोकरी का टोह में घर से बाहर हो गइलें.

तले धम्म से बिलारि उनुका आगा कूदलि आ बीतल बात बिसरि गइल.  बासो देखली उनुका सोझा चितकबरी बिलारि निकसारि से निकलल आ ओकरा पर झपटे खातिर कुकरु भीतर आ गइलन स.  बासो दउर के केवाड़ी लगावे चलली त सामने आवत खक्ख बिक्ख चेहरा देखली.  ऊ हकबका गइली.  

‘काहे हकबकाइल बाड़ू बासो ? अपना ददन के नईखू चिन्हत ?’

बासो के आंखि में खुशी के लोर छापि लिहलस.  दउर के उनुका गरदन प लटक गइली आ फफने लगली.  कुछ देर बाद जब मन शान्त भइल त पूछली कि इ सब कइसे भइल. 


‘जानतारू, जब हम सुरेमनपुर से छपरा गइनी त गोरखपुर जाये वाली गाड़ी टीसन पर खाड़ रहे.  जाके डिब्बा में जगह धइनी.  बगल में गोन्हिया छपरा के सरलू सिंह भेंटा गइलन.  गाड़ी खुले में देर रहुवे.  पैखाना लागल रहे से सरलू सिंह से कहनी कि तनी हमार झोरवा देखत रहेम.  गाड़ी के पयखाना में गइनी तऽ ओमे पानिये ना रहे.  धउरल मोसाफिर खाना में गइनी.  जल्दी जल्दी फारिग भइनी आ दउरत पलेटफारम पर गइनी तले गाड़ी खुल गइल रहे.  किस्मत देखऽ.  आउटर का लगहीं उ गाड़ी सामने से आवत मेल गाड़ी से टकरा गईल.  कतना जाने मरलें आ कतना घवाहिल भइलें.  हमहूं दउरत गइनी बाकिर ना तऽ सरलू सिंह भेंटइलें ना हमार झोरा.  सोचनी कि हो सकेला ऊहो हमरा चलते उतरि गइल होखसु.  दू घण्टा बाद एगो दोसर गाड़ी गोरखपुर खालिर खुलल त हम ओकरे से चलि गइनी.  ओहिजा सरलू सिंह का पता पर गइनी तऽ मालूम भइल कि ऊ अबहीं चहुंपले नइखन.  दू दिन उनुकर इन्तजार कइनी.  नोकरियो लागे में देरि रहे एहसे चलि अइनी हा.  अब फगुआ के बाद जाएम. ’

बासो धधाइ के ददन के अपना अंकवारी में बान्हि लीहली आ कहली -‘आगि लागो अइसनका नोकरी में.  हमरा अब चटकन लागि गइल बा.  अब हम रउआ के नोकरी पर ना जाये देम.  सेर भर सतुआ बरिस दिन खायेम, जाये ना देब परदेश. ’
------------
सम्पादक, शब्दकारिता,
अक्षरा प्रकाशन, विशाल संस्थान,
बलिहार, बलिया: 277 205
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई फरवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

दोहा

कविता

दोहा


- बद्रीनारायण तिवारी शाण्डिल्य



माया पगरी माथ पर, बन्हले घुंघरू पांव ,
जोहत जेठ लुवार में, दहकत शीतल छांव.

उठल पच्छिमी छितिज से धुंध भरल बातास,
उबचुभ हो अफना रहल, अब पुरुबी आकास.

लाख जतन केहू कइल, पानी पड़ल ना रेख,
कबहूं कहां मिटा सकल, ब्रह्मा के अभिलेख.

बाप कटोरा हाथ में, अबस पुकारसु राम,
बइठि बहुरिया बगल में, मरद थम्हावे जाम.

जनखा डफलि हाथ में, दिहलसि कतने ताल,
कुछउ हासिल ना भयल, बहुत बजवलसि गाल.

सोन चिरइया देहरी, फेंकलसि चाभी झोंझ,
सूतल मनुवा आलसी, कइलसि देहि न सोझ.

पिछुवारा पहरू ठनकि, कइलसि सबइ सचेत,
अब पछितइले का होई, चिरई चुगलसि खेत.

आजु काल्ह के पहल में, चुकल जवानी जोस,
दांत टुटल, चमड़ी झूलल, का कइला अफसोस.

जोति खेत क्यारी बनल,रोपलसि धान किसान,
पानी बिनु बिरवा झुलसि, भऽइल सांझि, बिहान.

अंगनइया में जमल बा, अब हिंजड़न के भीड़,
प्रजातन्त्र के ताल में, केने फुटी भंसीड़.
---------

213ए राजपूत नेवरी, बलिया 277001

(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

तिजोरी

कहानी

तिजोरी


- डा. अमरनाथ चतुर्वेदी



एगो जमाना रहुवे कि जगतपुर के शिवदहिन ओझा के नांव सगरे जवार में रहे.  के ना जाने उनुका के ? जगतपुर के ओझाजी का नाम से उहां का मशहूर रहनी.  कवनो पंचायत भा गांव के मसला फंसे तऽ ओमे पण्डित जी के जरूर बोलावल जाउ.  उहां के पंच का रुप में आपन जवन फैसला सुना दीहीं ओके लोग कोट-कचहरी का फैसला लेखा मानत रहल हअ.  उहों के कवनो लागलपेट बिना न्याय करे में हिचकत ना रहनीं हंऽ.  चाहे एकरा चलते काहे ना केहू से बिगाड़े हो जाव. न्याय के त ई मतलबे भईल कि दूध के दूध आ पानी के पानी हो जाव.

बाकिर समय के घनचक्कर केहू के ना छोड़े. जब राम अईसन राजा पर एगो धोबी लांछन लगा दीहलसि त शिवदहीन जी कवना खेत के मुरई रहलन ? एकदिन उनुको पर पंचायत बिटोरा गईल.

पण्डित शिवदहीन ओझा के पिताजी तीन भाई रहनी.  एकजाना के बिआहे ना भईल रहे. दोसरका के एगो लईकी रहे.  ओकरा जनमे का साल ऊ हैजा से मर गइलन.  ओह लईकिया के जनम के साल गांव में अईसन हैजा फैलल कि शायदे कवनो घर रहे जवना में कवनो मउत ना भइल रहुवे.  कुल्ह मिला के देखल जाव त एहबीच क समय पण्डित जी का परिवार पर बड़ा भारी पड़ल रहे.

एगो रांड़ भउजाई आ एगो बांड़ भाई लेके शिवदहीनजी के पिताजी कईसहूं आपन गाड़ी खींचत रहलें.  कहल जाला कि बड़ घर के रांड़ सांढ़ होली सऽ.  रोज रोज घर में कचकच होखे.  कबों भाई धमकावसु कि हम आपन हिस्सा बेंचि देम त कबो भउजाई झनकसु कि हम आपन हिस्सा बेटी दामाद के लिख देम. लईकिया त तनी सुगबुगइबो कईल कि ‘ए माई, तोरा के बा ? हमहीं नू बानी.  लिखि दे. ’

खैर एही कुल्ही चलत में शिवदहीन जी सेयान हो गइलीं.  घर के वातावरण शान्त रहे, एहसे ईहां के पढ़ाई लिखाई त कायदा से ना हो पावल, बाकिर बचपने से बुद्धि के बड़ा तेज रहनी.  मध्यमा पास करत करत बियाह गवन दूनो हो गईल. अब कहां के पढ़ाई आ कहां के लिखाई ? शिवदहीन जी घर गिरहस्थी में भिड़िया गइलीं.  जवना का चलते बाप के रहते घर के सरदारी पगरी शिवदहीन जी का माथे आ गइल.  एकरा बाद घर बाहर सबले कुल्हि झूर झमेला शिवदहीने जी के निपटे के पड़े.  उनुका लगे खेती का अलावे बाहरी कवनो दोसर आमदनी ना रहे.

शिवदहीन जी अपना बुद्धि आ पौरुष के सहारे परिवार के गाड़ी धीरे धीरे पटरी पर खींचे लगलें.  ओहि बीचे गांव में परधानी के चुनाव भइल आ शिवदहीन जी चुनाव जीत के गांव के परधान बनि गइलन.  धीरे धीरे इहां के लोकप्रियता बढ़े लागल.  घर के आर्थिको दशा सुधरे लागल.  चाचा के आ बड़की माई के विरोध इनका सोझा कम हो गइल, कारण चाहे जवन होखे.

शिवदहीन जी अपने त ना पढ़ि पवलें बाकिर अपना छोटका भाई रामकृपाल के खूब पढ़वलें.  जवना के नतीजा भइल कि पढ़ि लिखि के ऊ डिग्री कालेज में लेक्चरर हो गइलें.  ऊ आपन परिवार लेके शहरे में रहे लगलन.  उनुका तीन गो लइका आ एगो लइकी बिया.  शहर के खर्चा आ मास्टरी के नौकरी.  गांव घर के सुधि के पूछऽता ?

शिवदहीन जी जवना घरी घर के मलिकाना सम्हरलें, ओह घरी आर्थिक स्थिति त गड़बड़ रहबे कइल, खेतो बधार कुल्हि मिला के बीस बिगहा से अधिका ना रहे.  घर माटी के , कच्ची अंगनई रहे जेवना पर लकड़ी के खम्हिया गिरावल रहे. उहे बइठका का कामे आवे.  ओही खम्हियामें एगो लोहा के पुश्तैनी तिजोरी रहे.  जेवना के शुरु शुरु में शिवदहिन जी के बाबा अलीगढ़ से मंगववले रहलें.  तिजोरी त सामाजिक आब दाब के निशानी बड़ले बा, चाहे ओमे कुछु होखे भा मति होखे.

शिवदहिन जी अपना होती पुरनका मकान छोड़ि के अलगा मरदन खातिर बइठका बनववलीं.  पुरनका मकान के साढ़े नौ से मरम्मत करा के ओकर चारो ओर से छल्ली दिअवनी, आ गाय गोरू के अलगा से कच्चा बरदौर बनववनी.  खेतो बधार में कुछ बढ़इबे कइलीं. बेंचला के त कवनो सवाले नइखे. शिवदहिन जी के बाबूजी अपना कुल्ही भाईन का सन्ती एक सौ पचीस बरिस जी के शरीर छोड़नी.  काम किरिया त कइसहूं बीति गइल, बाकिर बरखी ना बीतल.  ओकरा पहिलहीं रामकृपाल जी के बंटवारा के अरजी आ गइल.

ई अरजी रामकृपाल जी के मेहरारू पहिले अपना जेठानी के दिहलीं.  त  ओकरा के शिवदहिन जी का सोझा पेश कइलीं.  बंटवारा के नाम सुनते पहिले त शिवदहिन जी के काठ मारि गइल, बाकिर कुछ देर बाद रामकृपाल जी के आ उनुका मेहरारू के बोला के समझावे के कोशिश कइलीं - ‘का बांटे के बा ? खेत बधार में तहार नांव चढ़िये जाई, आ घर दुआर में जहां चाहऽ उहां रहऽ.  के तहरा के रोकऽता ? बंटवारा कईला पर समाज में बड़ा बेइज्जती होखी.  तूं त अइसहीं कुल्हि के मालिक बाड़.  कुल्हि के मलिकाना देखऽ सम्हारऽ. अधवा के चक्कर में का बाड़ऽ ? हमरो अब सत्तर के नियराइल.  घर गिरहस्थी के बोझा अब चलत नइखे. ’

तबलहीं रामकृपालजी के बड़का कहऽता - ‘ बाबूजी ई कुल्हि चाल पट्टी रहे दीं.  बुढ़उ के पटिया के अबले बड़ा मजा कटनी हं.  हमनी का एहिजा रहम जा ? एहिजा कवन सुविधा बा? हमनी के कुल्हि ना चाहीं.  जवन हिस्सा बा तवने दे दीहीं.  आपन बेंचि बांचि के बिजनेस करब जा. ’ ई बाति सुनते शिवदहीन जी के बेहोशी छा गइल.  जेकरा सोझा बोले के हिम्मत गांव के नीक नीक लोग के ना करे ओकर अपने भतीजा फटर फटर बोले लागे आ भाईयो कहे - ‘भइया ठीके कहत बा. बेरोजगारी में का करीहें स ? पढ़ि लिखि
के नौकरी त अब मिलत नइखे.  ले दे के बिजनेसे एगो चारा बा.  हमरा पासे पूंजी त बा ना कि दे दीहीं.  खेती बारी एह लोग से संपरी ना.  त बेंचि के बिजनेसे करे लोग.  हम कबले कमाइब खिआइब ?’ अब एतना सुनिके ऊ मर्द कईसे होश में रही जे खुदे कुल्हिके सिरजवलने होखे?

अगिला दिने शिवदहीन जी अपना लइका प्रेम प्रकाश से कहलें - ‘ जा, चाचा के संग्हे.  कुल्हि खेत बधार देखा द. ’ आ संगही अपना भाई रामकृपाल से कहलें - ‘ ए कृपाल! जाके जवना खेत में जइसे मन करे वइसे बांट ल.  जवना ओर मन करे तवना ओर ले ल.  एके बात के हमरा ओर से धेआन दीहऽ कि कवनो पंच के मत बोलइहऽ. ’

खेत त बंटा गइल.  बाकिर बाग में आवत आवत रामकृपाल के साला आ गइलन आ घर दुआर के नम्बर आवत आवत दूनो पट्टी के मय रिश्तेदार जुटि गइलन.  अन्तदांव में नम्बर आइल गहना गीठो के, आ तिजोरी खोले के.  अबले त प्रेमप्रकाश शिवदहीनजी के कहला मोताबिक कुल्हि देखावत गइलें आ रामकृपालजी अउर रिश्तेदार लोग मिलि के बांटत गइल लोग. बाकिर अब गहना गीठो का बारे में त प्रेमप्रकाश के कुछ मालूमे ना रहे आ तिजोरी के चाभीओ उनुका लगे ना रहे.  एहसे मामिला फेर शिवदहीनजी किहां पंहुचल.  रिश्तेदार लोग कहल - ‘पण्डित जी, अउरा कुल्हि त हो गइल, बाकिर गहना के बंटवारा आ तिजोरी रहि गइल बा. ’ शिवदहीनजी जब तिजोरी के नांव सुनलें तअ रिश्तेदार लोग के हाथ जोड़ी के कहलें - ‘रउआ सभे अब जाईं.  हम रामकृपाल के अलगा से दे देब. ’ बाकिर ई बाति ना त रामकृपालजी के नीक लागल ना उनुका मलिकाइने के.  रामकृपालजी कुछ कहतें ओकरा पहिलहीं उनुकर मलिकाइन कहतारी - ‘जे गहनवा आ तिजोरी अब चोरिका बंटाई.  तबे नू गबडेढ़िया होई. ’ रामकृपालोजी कहलें - ‘भइया का भइल बा, सभ त हीते नाता बा. एह लोग से कवन चोरिका बा ? सभका सोझा रही त केहू केहू के बेईमान ना कही. ’ बाकिर शिवदहिनजी के ई बाति मंजूर ना भइल आ जेवना के नतीजा भइल कि उनुका पर पंचायत बिटोरा गइल.

शिवदहिनजी जवना इज्जत के बंचावल चाहत रहलीं उहे इज्जत अब समाज में उघार कइल जाई; इहे सोचत ऊहों के पंचायत में पंहुचलीं. पंच लोगन के आदेश भइल - ‘पण्डित जी, न्याय इहे कहऽता जे पुश्तैनी हर चीज में भाई के हिस्सा होला.  एहसे रउआ तिजोरी खोलीं आ ओहमें से पंच लोग का सोझा गहना से गीठो ले जवन होखे आधा आधा बांट दीहीं. ’ तब शिवदहिन जी कहलें - ‘अब ले त हम ई सोंच के तिजोरिया ना खोलत रहीं कि एकरा के हम अकेले प्रेमप्रकाश के देब.  बाकिर पंच के फैसला परमेश्वर के फैसला होला.  एहसे हई तिजोरी के चाभी बा.  देखीं सभे आ ईमानदारी से बांटी सभे. ’ अतना कहिके शिवदहिनजी अपना मुट्ठी में से तिजोरी के चाभी सरपंचजी के सौंप  दीहलें.

ओने सरपंचजी पंचन का संगे तिजोरी खोले चललें आ एने शिवदहिनजी के दिल के धड़कन बढ़े लागल.  जब तिजोरी खुलल त ओहमें खालसा कुछ कागज पत्तर आ एक बोतल सादा पानी मिलल.  पंच लोग जब बिस्तुर बिस्तुर कागज पढ़े लागल त पण्डित जी के जीवन भर के लेखा जोखा मिलल.  मय गहना गोठी के हिसाब किताब के फहरिस्त मिलल.  मोकदिमन के फाइल मिलल आ ओही में पचीस हजार के करजा के सरखतो मिलल.  ई करजा खेत लिखाये बेरा लिहल रहे आ आजुले दिया ना पावल रहे.  अब ई कुल्हि लेबे के केहू तैयार ना होखे.  रामकृपालजी अबहीं कुछ कहतें ओकरा पहिलहीं उनंकर मलिकाइन बोलली - ‘के कहले रहे उहां से जे कि करजा काढ़ के खेत खरीदीं आ घर बनवाईं ? अब के भरी ? हमरा आदमी का लगे पइसा बा जे ऊ दोसरा के करजा भरी ?’ पंचाइत अबहीं कुछ कहित ओकरा पहिलहीं हल्ला भइल जे पण्डितजी के हालत खराब होतिया.  सभ केहू धउरल.  जाके देखल जाउ त उहां के धड़कन बंद हो गइल रहे.

बड़ बुजर्गु  लोग कहल जे - ‘इज्जत के सदमा इज्जतदार ना बरदाश्त कर सके. ’
------------
द्वारा- श्री बैजनाथ चतुर्वेदी, एडवोकेट,
पशु चिकित्सालय के निकट, खुरहट, मउ

(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

का हम खुशी मनाईं

 का हम खुशी मनाईं


- त्रिभुवन प्रसाद सिंह प्रीतम



स्वागत ए छब्बीस जनवरी तोहरा पर बलि जाईं.
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?

घर में भूंजल भांग ना लउके, छउके मूस चुहानी.
कुक्कुर सूंघे छूंछ कंहतरी, फेंकल फिरे मथानी .

खाली पेट खराइल, भूक्खन नारा कवन लगाईं ?
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?

मेहरी के तन फटही लुगरी, कतना पेवन साटे.
जेकर करजा बा कपार पर, टोके राहे घाटे.

बीया, पानी, खाद, लगान के कईसे जुगुत लगाईं ?
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?

बबुआ कहलसि बाबूहो, हमके डरेस बनवा दऽ.
किरमिच वाला चउचक जूता जल्दी से मंगवा दऽ.

टका टेट के टा टा कहलसि, कइसे के समुझाईं ?
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?

नेताजी त भासन में राशन के बिछिली कईलें .
आशाके झांसा दे दे के, ऊ अपने दिल्ली गइलें.

ऊ संसद में चानी काटसु, हम छछनी छिछिआईं.
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?
------------------------
शारदा सदन,
कृष्णानगर, बलिया 277 001
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)


सोमवार, 6 जनवरी 2025

हम गीत अमन के गाइला

 कविता

हम गीत अमन के  गाइला


- सुरेश कांटक



जब जब आकाश उदासेला,
हर राह अन्हरिया में होला,
हम आपन दिया जर्राइं ला,
हम गीत अमन के गाइला.

जब बाज झपट्टा मारेला,
बिखधर के फन फुफकारेला,
चिरईन से सांस मिलाईला,
हम गीत अमन के गाइला.  

होरी में धनिया रोवेले,
रो रो  के दुखवा धोवेले,
हम गोबर के गोहराईला,
हम गीत अमन के गाइला.

धरती जब फूंका फारेले,
कुंहंकत कोईल जब हारेले,
हम आपन कलम उठाईं ला,
हम गीत अमन के गाइला.

सागर में आगि लहक जाला,
गागर में बाति बहकि जाला,
हम बहकल के बहलाईं ला,
हम गीत अमन के गाइला.

जब बाघ बकरियन के खाला,
जब दूध बिलरिया पी जाले,
बछरन के नीन भगाईं ला,
हम गीत अमन के गाइला.
-----------
कांट, ब्रह्मपुर, बक्सर - 802 112
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

करनी के फल

 कहानी

 करनी के फल


- दयानन्द मिश्र ‘नन्दन’



मु`शी सीतालाल अपना जमाना के नामी-गिरामी पहलवान रहले. इनका पास आपन खेत ना के बराबर रहे. इनकर बाबूजी दोसरा के  खेत लगान पर ले के बोअसु आ एगो भंईस  जरूरे राखसु. सीतालाल अहिरन के -झुण्ड में  रहसु आ पहलवानी करसु. भंइसि के दूध मिलबे  करे. धीरे धीरे इनकर देहि फूटल आ दस बीस  गांव में पहलवानी में गिनाए लगले. अपना  अखाड़ा पर दस आदमी के लड़ावला के बादो  जब दम ना आइल रहे त चारि पांच मील  दउरसु. धीरे धीरे इनकर नांव प्रदेश भर में  फइल गइल. पूर्वी जिलन में इनकर एगो स्थान  बनि गइल. ई कुल्ही सुन के इनका बाबूजी के  छाती फुला जाव आ ऊ बड़ा खुश होखसु.
 

कमालपुर गांव कायस्थन के रहे. अपना  बल का प्रभाव से अहिर लोग के मिला के  मुंशी सीतालाल कमजोर आदमियन के नाजायज  तरीका से दबा के ओहनी के जमीनन पर कब्जा  क लिहले. पहलवानी का चलते पूरा अहीर  समाज इनका साथे जीये मुए लगले. ओही गांव  के एगो कमजोर अहीर के लड़की बीस बाइस  साल के भइल रहे. ओकरा के बरिआरी ध के  अपना घरे ले अईलन आ ओकरा से शादी क  लीहले. ओही लड़की से सीतालाल के तीन गो  सन्तान भइले - रामाशंकर, दयाशंकर, आ  गौरीशंकर. तीनो जने पहलवान रहले बाकि खाली  रामाशंकर पहलवानी करसु. दयाशंकर खेती  करावसु आ गौरीशंकर रेलवे पुलिस के नौकरी.


खेती सम्हारे गांव में रहे वाला दयाशंकर  के संघतिया चोरे बदमाश रहले. ओहनिये का बल पर उनुकर धंउसपट्टी गांव में चलत रहे आ  एही बल पर ऊ गांव के परधानो हो गईलन. काम बड़ा चकाचक रहे. तीनो जाना के शादी  बिआहो समाज का अनुसार हो गइल. उपर  से देखीं त सबकुछ नीमन लउके. बाकिर असल हालात कुछ अउरे रहे. बाप सीतालाल के  आंख बुढ़ापा में आन्हर हो गइल रहे.  चश्मो पर ना लउके. देहि बेसम्हार भारी हो  गइल रहे. ठेहुनिया बइठल ना जाव आ ऊ  खड़े खाड़ी टट्टी पेशाब करसु.
 
 
रमाशंकर के नौकरी इलाहाबाद में चुंगी आफिस में रहे. दिन में काम आ सबेरे  सांझ अखाड़ा में पहलवानी. कुछ दिन बाद  उनुका लइका त भईल लेकिन मेहरारू मर गइली. उ लइका अपना उमिर में नीकहन  पहलवान निकलल. लेकिन दयानत बिगड़  गइल आ उ गलत संगत में पड़ि  गइलन. एगो लइकी से ईयारी हो गइल  रहे. ओही इयारी का निभावे में टीबी हो  गइल. दवा दारू ढेरे भइल लेकिन उ  बचलन ना. रमाशंकर का जिनिगिये में  परिवार साफ हो गइल. अकेले बुढ़ारी काटे  गांवे आ गइलन.


दयाशंकर लाल के एगो लइका आ एगो लइकी भईल. लइकी बड़ भइल त  ओकर बिआह कवनो कायस्थ परिवार में ना  हो पावल आ बाद में ऊ कवनो यार का  संगे फरार हो गइल. लइका के तबियत  हमेशा खराबे चले. लइकाईं से लेके अन्तिम  घड़ी ले ओकर दवाई बन्द ना भइल.


गौरीशंकर के कवनो बालबच्चा ना  भइले स. नौकरी से रिटायर हो गइलन त  रेलवे थाना पर बड़ा धूमधाम से उनकर  बिदाई समारोह मनावल गइल. सब सामान  पैक क के पहिलहीं ट्रक से गांवे पठा  दीहल रहे. बिहान भइला दू-चार गो सिपाही  इनका के गांवे पंहुचावे संगे चलल लोग.


संयोग अतना खराब रहे कि राहे में हवा लाग गइल आ कपार से लेके गोड़ तक  दाहिना आधा अंग फालिज के शिकार हो  गइल. आवाजो खतम हो गइल. जइसे तइसे  क के सिपाही सब गांव ले पंहुचवले.


सीतालाल का जिनिगीये में उनकर सगरे  परिवार के हालत खराब हो गइल.  दयाशंकर लाल के सोझा आन्हर बाप, बूढ़ महतारी, बूढ़ बड़ भाई, लकवा मारल छोटका  भाई, आ बेमार भतीजा पांच पांच गो आदमी के  इलाज आ खिआवल पिआवल के खरचा. सब
परधानी निकले लागल. आमदनी अठन्नी आ  खरचा साढ़े सात गो वाला हालत रहुवे. अइसना में उहे भइल जवन होला. धीरे धीरे खेत बेचाये लागल. दूइये चार बरिस में सगरी खेत बिका  गइली स. आमदनी के कवनो जरिया रहे ना.  बाद में इलाज बिना एक एक क के बेमारो  लोग मुए लागल. टूटल आत्मा लेके दयोशंकर  चल दीहलन भगवान घरे.


रह गइलन त सीतालाल. उमिर सौ बरिसा.  आंखि के आन्हर. देहि के पटकाइल. दलान प  फेंकाइल रहसु. ना केहू देखे वाला ना सुने  वाला. जवना दुआरी कबो बइठे के जगहा घट  जात रहे ओह दुआरी कुकुरो फेंकरे वाला ना  रहे. कबो कबो पुरनका नाता का चलते मेहरारू  के भतीजन में से कवनो आके फूफा के सेवा  टहल क जा स. ससुरारिये से खाना ओना आ  जाव.


दुआरी से गुजरत केहू के आवाज सुनस त  सीतालाल बोला लेस आ आपन कहानी सुनावे  लागसु. जवना घर के लइकी भगा के बिआह  कइलन ओही घर का टुकड़ा प जिनिगी चलत  रहे. ‘जुलुम किये तीनो गये, धन धरम औ बंस.  ना मानो तो देख लो रावण कौरव कंस.’ उहे  हाल रहे सीतालाल के. अब ऊ इहे कहसु कि  नाजायज काम ना करे के. नाजायज थोरही दिन  चमकेला बाद में ओकरा बिलाये में, नाश होखे  में देरी ना लागे. कहसु कि गंदा राह प चलला  प देहि में गंदा लागबे करी. हमरा जिनिगी से सभे सीखे आ माने कि कलियुग में अपना करनी  के फल एही जिनिगी में भोगे के पड़ेला.
---------
दिघार, बलिया.
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

रविवार, 29 दिसंबर 2024

लोकगीतन में जीवन के निस्सारता

 लेख

लोकगीतन में जीवन  के निस्सारता


- डा.भगवान सिंह भाष्कर



आजु ई संसार नश्वर हऽ. दुनिया के सब  नाता रिश्ता झूठ हऽ. आदमी एह संसार में  नाटक के पात्र के तरह आपन भूमिका निभावेला  आ जइसहीं ओकर रोल खतम होला ऊ संसार  रुपी मंच के छोड़ के चल देला. मरद मेहरारु,  बाप बेटा, हित नात, दोस्त दुश्मन सब छनिक  नाता होला. मुअला का बाद केहू केहू ना होखे.

 भारत के हर भाषा के साहित्य में जीवन  के निस्सारता से जुड़ल लिखनी के कवनो कमी  नइखे. परिनिष्ठित साहित्य होखे भा साहित्य, जीवन के नश्वरता के अनुगूंज हर जगह
 बराबरे सुनाई पड़ेला. मैथिल कोकिल विद्यापति जब सब ओरि से  हार गइलन त भगवान कृष्ण के शरण में अपना  के डाल दीहलें -

‘‘तातल सैकत वारि विन्दु सम,
सुत मित रमनी समाजे,
तोहे बिसरि मन ताहे समरपिलु,
अब मझु होवे कौन काजे,
माधव हम परिनाम निराशा.’’

लोक साहित्यो में अइसन गीतन के  भण्डार भरल बा जवन जीवन के निस्सारता का  ओरि इशारा करत बाड़े आ भगवत् भजन करे  के संदेश देत बाड़े. सब आदमी के इश्वर के दरबार में जरहीं  के पड़ी, आ पछिताये के पड़ी. एह स्थिति के  बरनन लोक गीत में देखीं -

‘‘एक दिन जाये के पड़ी परभू के नगरिया,
डगरिया बीच पछिताये के पड़ी.
उहवां कईल तू करारी,
भगति करम हम तोहारी.
ईहवां भूलल बाड़ माया के बजरिया,
डगरिया बीच पछिताये के पड़ी.’’

सब देहधारी के एक ना एक दिन भगवान का दरबार में जाहीं के पड़ी आ  ओह दिन पछिताहूं के पड़ी. काहे कि  ओहिजा से त तू कहि के चलल रहूवऽ कि  दुनिया में भगवान
के भगति करेम,  बाकिर एहिजा पंहुचला का बाद तू माया  का बाजार में आपन वादा भुला गइलऽ.  एहसे भगवान के ईहां जाये के राह में  तहरा अपना करनी पर पछिताहीं के पड़ी.

कहल गइल बा कि आदमी के अपना  गलती के अहसास हो जाव त ऊ सुधर  जाला. जीवन का कवनो चरण में ऊ सुधर  जाव आ भगवान का भगति में डूब जाव  त ओकर जिनिगी आ भविष्य संवर  जाई. एहि बाति के बरनन लोकगीत में  देखीं -

‘‘अबहिं बिगड़ल नईखे मनवा,
करऽ राम के भजवना,
ना त बान्हल जईब जम के दुअरिआ,
डगरिया बीच पछिताये के पड़ी.’’

हे मन, अबहिओं कुछ बिगड़ल नईखे.  अबहिओं से राम के भजन कर लऽ. ना  त जमराज का दरबार में तहरा के सजा  मिली आ भगवान के ईहां जाये के राह में  तहरा अपना करनी पर पछिताहीं के पड़ी.

विधि के विधान बड़ा विचित्र बा.  जनम केहू देला, भाग केहू अउर लिखेला,  आ मउत केहू तीसरा का हाथे बा. एकर  झांकी लोकगीत में देखीं -

‘‘केइये जनमिया हो दिहलें,
केइये मारेला टांकी?
कवन भइया आवेलें बोलावन हो रामा?

राम जी जनमिआ हो दिहलें,
बरम्हा मारेलें टांकी,
जम भईया आवेले बोलावन हो रामा.’’

आदमी के जनम देबे वाला के ह? के  ओकर भाग्य लिखेला? आ ओकर जीवनलीला के खतम करेला? एह सवालन के जवाबो ओही गीत में आगे बा कि रामजी  जनम देलें, ब्रह्माजी भाग्य लिखेलें, आ मउत का  बेरा जमराज के हाथ में बा.

जब कवनो आदमी के मउत होला त ओकर  शरीर अपना गति का चिन्ता में रोवे लागेला. एह भाव के बरनन लोकगीत में देखीं -

‘‘निकलत परान काया हो काहे रोई?
रोई रोई  काया पूछे माया से -
सुनहू माया चित लाई,
तू तऽ जइब अमरलोक में,
हमरो कवन गति होई?
निकलत परान काया हो काहे रोई?’’

प्राण निकलत घरी देह काहे रोवे? देह रो रो के आत्मा रुपी माया से पूछेला - तू त  अमर लोकि में चलि जईब बाकिर हमार का  परिनाम भा गति होई? मुवला का बाद आत्मा के आपन राह  अकेलहीं चले के पड़ेला. ओकर साथ देबे वाला  तब केहू ना रहे. महतारी मेहरारू भाई सब केहू  एहिजे रोवत रहि जाला. एकर बरनन लोकगीत  में  देखीं -

‘‘केश पकड़ के माता रोवे,
बांह पकड़ के भाई,
लपटि झपटि के तिरिआ रोवे,
हंस अकेला जाई.’’

आदमी के मुवला का बाद ओकर माथ अपना गोदि में रख के महतारी रोवत बाड़ी.  भाई ओकर बांह हिला हिला के रोवत बा. आ  मेहरारू ओकरा से लपट झपट के रोवत बाड़ी.
बाकिर केहू ओकरा संगे जाये वाला नइखे. सबकेहू एहिजे रहि जाई आ ऊ अपना आखिरी  सफर में अकेलहीं जाई.

आदमी कतना गलतफहमी में रहेला ! भर  जिनिगी ऊ अपना देहि के साबुन सोडा से मल  मल के धोवेला. ओकरा अपना देहि के कतना  फिकिर रहेला कि देहि चमकत रहो. काश, ऊ  जानि पाईत कि मुवला का बाद ई सब बेमानी  हो जाई. एहि बाति के अब लोकगीत में देखीं  -

‘‘एकदिन तरुवर के सब पत्ता,
झरि जईहें जी एक दिनवा.
ऐ देहिआ के मलि मलि धोवलऽ
साबुन सोडा लगाई.
सोना जइसन चमकत देहिआ
कवनो काम ना आई.’’

आदमी खाली दुनियादारी का फेर में  रहेला बाकिर जब ओकरा होश आवेला त  ऊ भगवान के गोहरावे लागेला. ऊ बुझ  जाला कि ओकर नाव के पार लगावे वाला  भगवान के छोड़ि के दोसर केहू नइखे. एह  मानसिक व्यथा के लोकगीत में बरनन देखीं  -

‘‘नइया बीच भंवर में
हमरो डगमगाइल बा,
जिअरा मोरि डेराईल बा.
दउड़ीं दउड़ीं किसन कन्हइया,
हमरो पार लगा दीं नईया.
रउरा चरन कमल में
दास लोगि लपटाईल बा,
जिअरा मोरि डेराईल बा.’’

एह गीत में अपना हालत से घबड़ाइल आदमी भगवान के गोहारत बा कि हे  किसन भगवान दउड़ के आईं आ हमरा  नाव के पार लगादीं. दुनिया भंवर में डूबे  से डेराइल राउर दास लोग रउरा गोड़ि से  लिपटाईल बा कि रउरा ओह सब लोग के  पार लगा दीं.

सांचो ई जीवन नश्वर बा. लोकगीतन जीवन के निस्सारता के चर्चा एह लेख में  संक्षेप में कइल बा. भगवान के भजन  बिना ई मानव जनम सार्थक ना हो सके.  दुनिया के मायाजाल में ना फंसि के हमनि  के भगवान का चरण में अपना के समर्पित  कर देबे के चाहीं. भगवान के किरपा हो  जाई त सब कुछ पार लाग जाई.

महामंत्री,
अ.भा.भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना.
सम्पर्क - प्रखण्ड कार्यालय का सामने, सीवान.

(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

दू गो गजल

 दू गो गजल


- पद्मदेव प्रसाद ‘पद्म’


(एक)



 कल तक रहल जे पावा, उ सेर हो गईल.
 निपटे रहल गंवार जे, अहेर हो गईल .

भांजत रहल जे हरदम, छाती उठाइ के.
देखत मतर में बाज से, बटेर हो गईल..

झोली जे हाथ ले के, घर घर घूमत रहे.
झेपते पलक के, बिड़ला कुबेर हो गईल..

ताकत से जे कि अपना, ढकले रहे गगन.
मउवत का पांव खींचते, ऊ ढेर हो गईल..

आसन पर ऊंच बईठल, जे कि रहे धधात.
लुढ़कते जमीं पर, गउरा गंड़ेर हो गईल..

के बा समर्थ अईसन, जे ना उठल गिरल.
राजा रहे जे कल तक, ऊ चेर हो गईल..

( दू )


सबुर बाटे हमके गिरानी से अपना.
सबुर बाटे टूटल पलानी से अपना.

अब सबुर के सिवा बाटे रह का गईल.
सबुर बाटे घीसल जवानी से अपना.

कुछ बतवनी, छिपवनी भी उनुका से हम.
सबुर बाटे बीतल कहानी से अपना.

दर्द आपन सुनाके हम कर का सकीं.
कहल कुछ ना चाहीला बानी से अपना.

सबे बाटे जानत बतावे के का बा .
लुटाईं ना राहे पर पानी के अपना.

लिखके कविता कहानी गजल जात बानी.
सबुर बाटे एही निशानी से अपना.

-----
बुढ़नपुरवा, बक्सर, बिहार
--------------
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

के ह लक्ष्मी

 लेख

के ह लक्ष्मी


- अजय कुमार काश्यप



सृष्टि से पहिले श्रीकृष्ण के वाम भाग से लक्ष्मी के आविर्भाव भइल रहे. लक्ष्मी बड़ा सुन्दर रहली. जनम का साथे ऊ दू रुप में बंट गइली. ई दूनो रुप अवस्था, आकार, भूषण, सुन्दरता, रंग वगैरह सबमें एक समान रहे. एगो के नाम लक्ष्मी पड़ल आ दोसरका के राधिका. ई दूनो रुप के अभिलाषा पुरावे खातिर श्रीकृष्ण दक्षिणांश से द्विभुज आ वामांश से चतुर्भुज रुप धारण कइनी. द्विभुज रुप राधाकांत आ चतुर्भुज रुप नारायण भइनी. राधाकान्त राधा आ गोपियन संगे ओहिजे रह गइनी आ नारायण लक्ष्मी संगे बैकुण्ठ चल गइनी.


लक्ष्मीजी नारायण के अपना वश में कर के सब रमणियन में प्रधान भ गइली. ई लक्ष्मी स्वर्ग में इन्द्र के संपतिरुपिणी स्वर्गलक्ष्मी के रुप में, पाताल आ मृत्युलोक के राजा के पास राजलक्ष्मी का रुप में, गृहस्थ का पास गृहलक्ष्मी का रुप में, चन्द्र, सूर्य, अलंकार, फल, रत्न, महारानी, अन्न, वस्त्र, देवप्रतिमा, मंगल, घर, हीरा, चन्दन, नूतन,मेघ आदि सबमें शोभारुप में विद्यमान रहेली. लक्ष्मी देवी शोभा के आधार हईं. जवना स्थान पर लक्ष्मी ना रहस उ स्थान शोभाशून्य हऽ.

एक बेरि के बाति हऽ. महर्षि दुर्वासा बैकुण्ठ से कैलाश जात रहीं. देवराज इन्द्र बहुत आदर से प्रणाम कइनी. दुर्वासा ऋषि खुश होके पारिजात के फूलन के माला इन्द्र के दीहलें बाकिर अहंकार में डूबल इन्द्र ओह माला के अपना हाथी ऐरावत का माथ प ध दीहलन. ऐरावत ओह माला के जमीन प फेंक दिहलस. ई सब देख के दुर्वाासा जी के खीस के पार ना रहल आ इन्द्र के सराप दिहलन कि जा तहार अहंकार के जड़ लक्ष्मी तहरा के छोड़ दीही. संगही उहां का ईहो कहनी कि जवना माथे ई माला पड़ल हऽ होकरे पूजा सबसे पहिले होई.

दुर्वासा का सराप का चलते लक्ष्मीजी इन्द्रलोक छोड़ के चल गइली. लक्ष्मीहीन इन्द्र देवतालोग के साथ ले के तब ब्रह्मा जी का शरण में पंहुचलन. ब्रह्मा जी ओह लोग के ले के विष्णुजी का लगे गइलन आ सब किस्सा कहलन. पूरा बाति सुन के विष्णुजी देवता लोग के सलाह दिहनी कि चिन्ता छोड़ऽ जा. तहरा लोगन के लक्ष्मी फेरु मिलिहन. विष्णुजी ओहलोग के इहो बतलवनी कि लक्ष्मी कहां कहां रहेली आ कहवां ना टिकस. एकरा बाद उहांका लक्ष्मीजी के आदेश दीहनी कि जा समुद्र में जनम ल. ब्रह्मा जी से कहनी कि रउआ सभ देवता लोग का संगे समुद्र मह के लक्ष्मीजी के उद्धार करे के कोशिश करीं.

बादमें समुद्र मथाईल आ लक्ष्मीजी ओह मंथन में प्रकट भइली. एहतरे लक्ष्मीजी के उद्धार भईल आ विष्णु भगवान फेरु उनुका के अपना लिहलन. ईहे लक्ष्मी जी के कहानी ह.
--------


अनुवादक: - मुकेश
अभिनन्दन कुटीर, सतनी सराय,
बड़ी मठिया, बलिया - 277 001

(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी,

 गीत


- देव कुमार सिंह


(एक) जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी,


 

जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

खालि खाए खातिर जिनिगी धिक्कार भाईजी.

जब पुण्य अनधा जुटेला, नर तन तबहीं मिलेला,
सेवा तप करऽ उपकार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

ई जग हवे एगो डेरा, स्थायी ना हवे बसेरा,
काहे करेलऽ तकरार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

जे जिनिगी पेट पोसे में गंववावल,
देशवा के जे शान ना बढ़ावल,
ओकर जिनिगी धरतिया पर भार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

आपस के भेद सब मिटावऽ,
सबके गलेसे लगावऽ,
बांटऽ दंनिया में सुख शान्ति पयार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

भूखड़ा के भोजन करावऽ,
नंगा के वस्त्र पहिरावऽ,
तबे होई तहार जिनिगी साकार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

(दो) कब होई देशवा में भोर

 

कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?
सुख के सुरुज कब होइहें उदितवा,
कब होई इहवां अंजोर ?

देशवा आजाद भईल, अइसन सुनाइल सबके,
सुखी गांव नगर होई,
अइसन बुझाइल सबके.
पड़ल मेहनत के अंखिया में माड़ाऽ.,
ढर ढर ढरकेला लोर,
कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?

आकि ई आजादी बबुआ,
टोपी में भुलाइ गइल,
आकि सब सेठवा तिजोरी में लुकाइ लिहलें,
आकि उहो बाड़े अभी लरिका गोदेलवा,
चललें ना झोपड़ी का ओर,
कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?

आकि इ मगन बाड़ें कुरुसी का खेल में,
आकि नौकरशाही इनके
डालि दिहलस जेली में,
अंखिया फोड़ाई गइल इनका जनमते,
आकि भइलें ना अभी अंखफोर,
कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?

आकि पनरह अगस्त रहे सुनर सपनवा,
अधनीनीये में भइल सुरुज दरसनवा,
उरुआ बोले, चमगादड़ उड़ेला,
अभी बाटे अन्हार खूबे घनघोर,
कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?
-----
प्रवक्ता, इन्टर कालेज, जमालपुर
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

लोरी : चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला

 कविता

लोरी : चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला


- सुरेश कांटक



चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला,
राजा जी का राज में पड़ल बाटे पाला.

तेल चढ़ल ताड़ प, आकास में मसाला,
अदिमी बेकार, रोजगार ना भेंटाला.

टोपिया बा टप प, किसान जहर खाला,
चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.

चुप रहऽ, चुप रहऽ, मिलि गइल बालू,
सभ धन घोंटि गइल कालू जी के भालू.

हमनी के गुदड़ी, आ उनुका दोसाला,
चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.

बइठल निठाला, हमरा पंउवा में छाला.
पेटवा प पाला डाले, मुंहवा प ताला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
कांटक कहेले ओकर आका बाड़ें काका,

अपना सवादे बन करे नाका नाका.
लेबे खातिर धरती, मचवले बाटे हाला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
जलदी सयान होखऽ, नाग के नचईहऽ,

आरे मोरे बाबू एह बाग के बचईहऽ.
दईंता पाताल के ले जात बाटे खाला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला,

राजा जी का राज में पड़ल बाटे पाला.
सउसे जिनिगिया विपतिये में कटल,

अणु बम छोड़े के बेचैन बाड़े पटल.
कहेले कि राम दोसर, दोसर हवे आला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
छम छम नाचेले मंहगिया बजार में,

नमरी के चीझुआ बेचात बा हजारमें.
कवन दो मुदईया लगावे मकड़जाला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
चुप रहऽ, चुप रहऽ, काल्हु भात खईब,

ढेर नधिअइब त मार लात खइब.
नेतवन के पूत मरे, कइलन स घोटाला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
परपी भगवनवा के आंखि बाटे फूटल,

हमनी के मूसरे से सीखले बा कूटल.
पछ करे पड़वन के पाके फूल माला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
दिनों दिन बढ़ता, जे काला धन खाला,
--------
कांट,
बक्सर - 802 112कविता
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

मगन किसान बाड़ें

कविता

मगन किसान बाड़ें


- शम्भु नाथ उपाध्याय



मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.

गदराइल मटर सरसो, तीसी चनवा फुलाइल,
रंग बिरंगा खेत देखिके,
खेतिहर बा अगराइल.
हंसेला किसानवां, सोचेला आपना मनवां,
असों नाहीं रही बड़की बंचिया कुंआरी,
मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.

चनवा दे दी साहू के करजा,
मटरा खाद के खरचा,
घरवाली के समुझाइब,
मति करिहे तू चरचा.
गेंहुआ खिआदी संउसे बराती,
तेल के खरचा सरसउवा सम्हारी,
मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.

जउवा सभ लरिकन के पाली,
दालि बनि लेतरी के,
बा अभाग, धनिआ का देखीहें
सपना देवपरी के ?
गुरवा बिकाई, पगरी रंगाई,
धनिया के बेसाहबी छापलिसारी,
मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.

बाछावा देके करबी निहोरा,
रुसल हित मनाईबि,
हं भगवान आस के पूरव..,
हम परसाद चढ़ाइबि.
पुरइबि सपनवां, चहकी अंगनवा,
डोलि चढ़ि जा दिन दुलहा अईहें दुआरी.
मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.
-------
तिखमपुर, बलिया - 277 001
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

बाटे क दिन के ई जिनिगी

 

कविता

बाटे क दिन के ई जिनिगी


- डा. बृजेन्द्र सिंह ‘बैरागी’


कशमीर से कन्याकुमारी तक हई देखीं,
होत बाटे पाप अपराध रोज जघन्य जी.
खात बाटे अदमी के अदमिये अब देखिं,
करताटे कुकरम धुआंधार ई अक्षम्य जी.

कहताटे शौक से सीना तानि अदिमी ई,
बा धरम ईमान सत्य प्रेम अब अमान्य जी.
जीओ चाहे मरो अब अदिमिअत भागि से,
प्रेम के पुजारी बाड़ न ईहवां नगण्य जी.

दिनों दिन बढ़त बाटे गिनति असुरवन के,
परंम के सजात बाटे चितवा असंख्य जी.
मान स्वाभिमान अब बचाईं लींजा हिन्द के,
परेम के जलाई जोति घर घर अनन्य जी.

परेम से रंगाइल रंग में बसेलन सुदामा कृष्ण,
नानक, कबीर, बुद्ध, सूर,तुलसी, चैतन्य जी.
पशु पक्षी पेंड़ अउर पहाड़ के सुनाम सुनीं,
होई जाई भारत वैकण्ु ठ धन्य धान्य जी.

शान्ति अहिंसा अउरी प्रेम के पढ़ाईं पाठ,
कशमीर से कन्याकुमारी तक एकरम्य जी.
कहेलन बैरागी विचार करीं भाई जी,
बाटे कई दिन के ई जिनिगी सुरम्य जी.
-------
आदर्श नगर, सागरपाली, बलिया- 277506
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

लघुकथा संग्रह थाती से पाँच गो कहानी

लघुकथा संग्रह थाती से पाँच गो कहानी

- भगवती प्रसाद द्विवेदी


 

(1) त्रिशंकु

सबेरे जब पता चलल कि मुहल्ला के सुरक्षा बेवस्था खातिर एगो समिति के गठन कइल गइल हा, त हम अपना के रोकि ना पवली आ सचिव पद खातिर मनोनीत अपना मकान मालिक का लगे चहुँपली, 'सिन्हा जी सुने में आइल हा जे रउआँ सभे काल्ह सांझी खा मुहल्ला के लोगन के जान माल के हिफाजत खातिर एगो समिति के गठन कइनीं हां, बाकिर हमरा के रउआं सभ बोलइबो ना कइनी?'

'आरे भाई, रउआँ अस किराएदार लोगन के का ठेकाना!' सिन्हा जी हमरा के समुझावे का गरज से कहलन, 'आजु इहां बानीं. कालह मुहल्ला छोड़ि के दोसरा जगह चलि जाइब. एह मुहल्ला के स्थायी नागरिक रहितीं त एगो बात रहित!' हम भीतरे भीतर कटि के रहि गइलीं.

अबहीं बतकही चलते रहे, तलहीं गांव से पठावल आजी के मुअला के तार मिलल आ हम बोरिया बिस्तर बान्हि के गांवे रवाना हो गइलीं.

आजी के सराध के परोजन से छुटकारा पवला का बाद एक दिन परधान जी के चउतरा का ओरि टहरत गइलीं त देखलीं कि मंगल मिसिर के एह से कुजात छाँटल जात रहे काहे कि ऊ अपना जवान बेवा बेटी के फेरु से हाथ पियर करे जात रहलन.

'पंच लोग! रउआँ सभे ई अनेत काहें करे जा रहल बानीं?' अबहीं हम आगा बोलहीं के चाहत रहलीं कि परधान जी हमरा के डपटि के हमार बोलती बन क दिहलन, 'तूं कवन होखेलऽ एह ममिला में दखल देबे वाला? अपना शहर में ई शेखी बघरिहऽ! ई गांव के ममिला हऽ, बुझलऽ?'

रउएँ बताईं, हम अपना के गँवई सनुझी आ कि शहरी?

-------

(2) न्यूट्रान बम

मुखिया जी अपना दुआर पर हुक्का गुड़गुड़ावत अखबार बाँचत रहले. एक ब एक उन्हुकर निगाह एगो खबर पर जा के अँटकि गइल आ ऊ बगल में बईठल समहुत चउधररी के झकझोरलें, 'समहुत भाई, अब त ई बिदेसी वैज्ञानिकओ गजबे जुलुम करे जा रहल बाड़े स!'

'ऊ का मुखिया जी? कवनो खास खबर छपल बा का?'समहुत चउधरी मुँह बा के सवाल कइले

'हँ भाई! उहाँ के वैज्ञानिक लोग एगो बम बना रहल बा न्यूट्रान बम! ई बम जहवाँ गिरी उहवां के घर दुआर त सही सलामत बाँचि जइहें स, बाकिर जीयत परानी जरी सोरी साफ हो जइहें.' मुखियाजी असलियत बतवले.

'बाप रे, अइसन जादू!' समहुत चिहुँकले.

'हँ हो! बाकिर जब आदमिए ना रही त इ चीज बतुस आ घर दुआर रहिए के का करी!'मुखिया जी हुक्का एक ओरि ध दिहले.

'बाकिर मुखिया जी, ई त कवनो नयका बाति नइखे बुझात. अइसन बम त इहवाँ पहिलहीं से बनल शुरु हो गइल बा.' समहुत चउधरी कुछ सोचत कहले.

'का बकत बाड़ऽ समहुत भाई! न्यूट्रान बम आ अपना देस में?'मुखिया जी अचरज से पुछलन.

'ठीके कहत बानी मुखिया जी! चिहाईं मति! अपना देस में पढ़ाई के एगो अइसने न्यूट्रान बम छोड़ाइल बा. तबे नूँ जब आदमी पढ़ि लिखि जात बा, तब ऊ बहरी से ओइसे के ओइसहीं रहत बा, बाकिर ओकरा भीतरी के आदमीयत मरि जात बा. आ जब आदमीयते ना रही, त आदमी ससुरा रहिए के का करी!' मुखिया जी अबहुँओ समहुत का ओरि टुकुर टुकुर ताकत रहले.

------

(3) अबला

बेरोजगार सुशील अँगना में बँसखट पर बइठि के 'रोजगार समाचार' में रोजगार ढूँढ़े में लवसान रहले. माई पलँगरी पर बईठि के 'पराती' के कवनो कड़ी मने-मन बुदबुदात रहली.

धनमनिया तवा पर रोटी सेंकति रहे. ओकर देहिओ गरम तवा लेखा जरति रहे. बाथा का मारे माथा फाटत रहे. ओकर मन रोवाइन-पराइन भइल रहे.

तलहीं नीके तरी खियाइल तवा पर रोटी सेंकत खा धनमनिया के हाथ जरि गइल. भरि तरहत्थी फोड़ा परि गइल. दरद का मारे तड़फड़ात एगो बेपाँख के चिरई-अस घवाहिल होके ऊ आँचर से लोरपोंछत बड़बड़ाए लागलि, 'हमार करमे फूटि गइल रहे. ... एह से नीमन रहित जे बाप-महतारी हमरा के कुईयाँ में भठा देले रहितन... हमरा के जहर-माहुर दे के....'

'ऊँह! ई नइखे सोचत जे तोरा अइसन चुरइल के अइसन भलामानुस घर कइसे मिलि गइल!' पलँगरी पर करवट बदलत सुशील के माई जवाब दिहली.

उन्हुकर बोली धनमनिया के जरला पर नून नियर लागल. ओकरा देहि के पोर-पोर परपरा उठल. ऊ मुँह बिजुका के चबोलि कइलस, 'काहे ना! हमार सुभागे नूं रहे जे अइसन कमासुत मरद, नोकर-चाकर...!'

सुशील तिलमिला के आँखि तरेरले. उन्हुकरा बुझाइल जइसे उन्हुकर खिल्ली उड़ावल जात होखे.

'बात गढ़े त खूब आवेला कुलच्छिनी के!' धनमनिया के सासु अब बिछौना पर से उठिके बइठि गइल रहली, ' सुशीलवे हिजड़ा अइसन बा जे तोरा-अस कुकुरिया के घर मे रानी बना के बइठवले बा. दीगर मरद त कबहिएँ कुईयाँ में भसा आइल रहित. ना रहित बाँस ना बाजित बाँसुरी!'

सुशीलो के ताव आ गइल. मरदानगी के चुनौती! ऊ 'रोजगार समाचार' के भुईयाँ बीगि के देहि झाड़त ठाढ़ हो गइले आ पत्नी के देहि पर लात-झापड़ आ मुक्का बरिसावे लगले, 'हरामजादी! तोर अतना मजाल! हमरा देवी-अस महतारी से लड़त बाड़े? हम तोर चमड़ी नोचि घालबि.'

धनमनिया एने चुपचाप रोवति-बिलखति रहे आ सुशील आपन मरदानगी देखावत ओकरा के अन्हाधुन्हि लतवसत रहले. थोरकी देरी का बाद, जब ऊ हफर-हफर हाँफत हारि-थाकि गइले त ओकरा के ढाहि के बहरी बरंडा में चलि गइले.

धनमनिया के अइसन लागल जइसे केहू ओकरा देहि में आगि लगा देले होखे आ ओकर सउँसे देहि धू-धू क के जरति होखे. ऊ कहँरत उठलि आ फेरु रसोई बनावे लागलि.

चूल्हा बुता के आँचर से आँखि पोंछत धनमनिया सुशील का लगे जा के ठाढ़ हो गइलि, 'अजी, सुनऽ तानीं? चलीं, खा लीं!'

'हम ना खाइब!' सुशील झबरहवा कुकुर-अस झपिलावे लगले, ' तें भागऽ तारे कि ना ईहाँ से?'

'चलीं ना, हमार किरिया...' धनमनिया सुशील के बाँहि ध के खींचे लागलि.

सुशील झटकरले,'हम ना खाइब... ना खाइब...ना खाइब!'

'हमरा से गलती हो गइल. माफ क दीं.' धनमनिया सुशील के गोड़ ध के माफी माँगे लागलि. बाकिर सुशील दाँत से ओठ काटि के एगो भरपूर लात ओकरा देहि पर जमा दिहले, 'हरामजादी! नखड़ा देखावत बाड़े? हमरा से बोलिहे मत!'

धनमनिया आह क के गिरलि, फेरु उठल आ घर में ढूकि गइलि. थोरकी देरी का बाद खिड़की राहता से ऊ बहरी निकलि गइल. बाकिर कबले ऊ अबला बनल रही? सवाल झनझनाए लागल आ ऊ सबक सिखावे खातिर कड़ेर हो के अततः वापिस लवटे लागलि.

-----------

(4) धरम करम

भिनुसहरा होत पंडीजी जइसहीं कनखियवनीं कि भगत लोग ओकरा के अन्हाधुन्ह पीटल शुरु कऽ दिहल आ तब ले ओकर ठोकाई होते रहि गइल जब ले ऊ बेहोश ना हो गइल. भला होखे त काहें ना, भला चर्मकार होके मठिया में ढूके के गलती जे कइले रहे!

साँझी खा मठिया में भगत लोग के भीड़ देखते बनत रहे. पंडी जी पाठ शुरु कइनीं, - ' जात पाँत पूछे ना कोई, हरि के भजे से हरि के होई'...

-------


(5) महिमा

जब खटिया पर अलस्त होके परल बेमार मेहतारी के फाँका ओकरा से देखल ना गइल त ऊ सिंगार-पटार क के घर से बहरी निकले लागलि. माई कहँरत पूछलसि, ' अरे फुलमतिया,कहवाँ जा तारे?'

' बस अबहिएँ आवत बानी, माई! तनी बसमतिया सखी के घरे जात बानी.' ऊ कुलाँचत बहरी निकल गइलि.

फुलमतिया दुलुकिया चाल से चलत सेठ धनिक लाल के हवेली का ओरि बढ़े लागलि. ओहे दिने कइसे ऊ ओकरा के लालच देखावत रहलन! गिद्ध नियर उन्हुकर आँखि ओकरा देहि पर गड़ले रहि गइल रहे. चलऽ, सेठ के मन के भूख मिटवला का बदला में माई के पेट के भूख आ लमहर दिन से चलत आवत बेमारी त मेटी.

जब फुलमतिया माई के हाथ मे ढेर खानी नोट गिनि के थम्हवलसि त माई के अचरज के ठेकाना ना रहे, ' फुलमतिया, अतना रोपेया कहवाँ से चोरा के ले अइले हा रे?'

' माई, सड़क पर गिरलरहल हा. हम उठा लिहली हा.' फुलमतिया जान बुझि के झूठ बोललसि.

' भगवान! सचहूँ तूँ सरब सकतीमान हउवऽ! गरीब गुरबा के छप्पर फाड़ि के देलऽ तूँ. तहार महिमा अपरम्पार बा. हे दीनानाथ!' आ फुलमतिया के माई ढेर देरी ले नोट के छाती से लगा के भाव विभोर हो के ना जाने का का बुदबुदात रहि गइलि.

------

(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई सब कहानी साल 2006 में अंजोर भइल रहल)

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

विकास माने हाफ पैंट

 ललित निबन्ध

विकास माने हाफ पैंट


- डा. दिनेश प्रसाद शर्मा

एह लेख के मथेला पढ़िके काहे चकचिहाइल बानीं ? काहे भकुआईल बानीं जी ? रउआ इहे नू सोचत बानीं कि भला इहो कवनों मथेला में मथेला भइल ? कहवां विकास आ कहवां हाफ पैंट ! एह दूनो के तालमेल कइसे बइठि गइल ? दूनों के गोटी एके जरे कइसे सेट हो गइल ? एह दूनों के एक दोसरा से कवनो तालमेल हइये नइखे त इन्हनीं के एके जरे रखला के मतलब ? घबड़ाईं जिन. हम फरिया फरिया के फरिआवत बानीं नू. दूनों के गोटी एक जरे बइठावत बानीं नू.

कवनो जीव जब एह धरती पर जनम लेला त ऊ आपन पूरा जिनिगी के लम्बाई चौड़ाई के सभसे छोटहन रूप में रहेला. जइसे जइसे समय बीतल जाला भा ई कहीं कि ऊ जीव आपन उमिर जीअत जाला ओइसे ओइसे ओकर लम्बाई चौड़ाई बढ़त जाला. प्रकृति के ई अइसन ना नियम बा जेकरा के नकारल ना जा सकेला. हं, ई हो सकेला कि कुछ खास जीव के बढ़े के हिसाब किताब कवनों खास उमिर पर जा के रुकि जाय आ कुछ के ता-जिनिगी चलत रहे. हमरा आजु तले ई सुने में ना आइल कि एह धरती प कवनों जीव अइसनो बा जवन जनम के बेरा आपन जिनिगी के पूरा लम्बाई चौड़ाई में रहे आ जइसे जइसे ओकर उमिर बढ़त गइल ओइसे ओइसे ओकर लम्बाई चौड़ाई घटत घटत एकदम सोना पर पहुंचि गइल. अइसे त एह धरती प एक से एक जीव पटाइल पड़ल बाड़ें. कुछ हमनी के लम्बाई चौड़ाई से कई गुना जादे बड़, त कुछ अइसनों जवना के खुला आंखि से देखलो ना जा सकेला. एहसे अगर प्रकृति अपना गरभ में ओइसनको जीव के रखले होखे जवन उमिर के साथ अपना लम्बाई चौड़ाई में घटत जाला त इ हमरा जानकारी के बाहिर के बाति बा.

एह धरती प के सभसे अजूबा जीव आदमी ह. ऊ अपना आप के अपना कारनामा से दोसर दोसर जीव से एकदम अलगा साबित क देला. मानव समाज में जब कवनों लईका जनम लेला त ओकरा के खाली एगो लंगोटी आपन खास जगह के तोपे खातिर पहिरावल जाला. ओह घरी ऊ अपना जिनिगी के सभले छोट लम्बाई चौड़ाई में रहेला. जइसे जइसे ऊ लइका आपन उमिर बितावल शुरू करेला ओकरा लम्बाई चौड़ाई के अनुपात में ओकरा लंगोटियो के लम्बाई चौड़ाई बढ़त जाला. ऊ लंगोटी अब चड्ढी के रुप ले लेले रहेला. फेनु उहे चड्ढी हाफ पैन्ट का रुप ध के एगो नया रुप में लउके ले. उहे लइका जब जवानी के देहरी प आपन गोड़ ध देला, फुल पैन्ट भा पाजामा के अपना चुकल रहेला. जइसे जइसे आदमी के उमिर में बढ़ोतरी होला ओइसे ओइसे देह के आकार के संगे संगे ओकरा देहि के बहतरो में बढ़ोतरी होत जाला.

लइका जबसे किशोरावस्था में आ जाला ओही घरी से ऊ चाहेला कि ओकर टंगरी पूरा के पूरा तोपाइल रहो. ऊ भरसक एही फेर में रहेला कि ओकर टंगड़ी एड़ी के उपर उघार मत लउके. एकरा खातिर ऊ फुल पैन्ट भा पाजामा अपनावेला. लइकाईं में ऊ एह बाति प कवनो खास धेयान ना दे काहे कि ओह घरी ले ओकरा दिमाग में ओतना चरफर ना भइल रहेला. ओह घरी ओकरा में सोचे समुझे के अतना ताकत ना रहेला तबो ऊ अपना से उमिरदार आदमी के देखि के सीखे के कोसिस करत रहेला. जइसे जइसे ऊ बड़ होत जाला, छोट से छोट बाति प धेयान देबे लागेला.लइकन के लइकाई वाला हरक्कत अगर बूढ़ भा सयान आदमी करे लागेला त ई दोसर लोग के हजम ना होखे आ उनुका मुंह से बरबस निकल जाला कि का लइकभुड़भुड़ई कइले बाड़ऽ ?

कुछे दिन पहिले के बाति ह. हमनी के देस में पुलिस डिपाट में सिपाही जी लोग के हाफपैन्ट पहिन के डिउटी करे के पड़त रहे. कपार प के बार एकदम सन हो गइल बाकि उनूका डिउटी में फुलपैन्ट पहिने के इजाजत ना रहे. ना जाने सरकार के दिमागी कारखाना में कवन अइसन फारमूला तइयार भइल कि ऊ उनुका लोगन के हाफपैन्ट के जमानत जब्त क के फुलपैन्ट पहिरे के फरमान जारी क दिहलस. कुछ खास बाति त जरूरे होखी. हमरा त इहे बुझाला कि सरकार के बूझला इ पसन ना पड़ल कि बूढ़ बूढ़ सिपाही हाफपैन्ट पहिर के आध उघार हालत में आपन डिउटी करे. इनिका लोग के अपना डिउटी का समय में हरेक किसिम के आदमी से पाला पड़ेला. जवना में लइका सयान मरद मेहरारू सभे रहेलन. सभका बीच में सिपाही जी के हाफपैन्ट में घूमल भला नीक कइसे कहाई ?

ई सभ बाति त मरदन के भइल. अगर मेहरारूअन प नजर ना फेरल जाइ त ई उन्हनीं का संगे सरासर अन्याय होखी. काहे कि हमरा देस में मरद मेहरारू दूनो के बराबर के अधिकार मिलल बा. अगर ओह लोग का बारे में कुछ ना कहाई त ई ओह लोग के अधिकार के हनन होखी. हमरा कवनो अधिकार नइखे बनत कि सरकार से मिलल ओह लोग के सरकारी अधिकार के नजरअंदाज करीं भा ओकर मजाक उड़ाईं.

लइकी जब नन्ही चुकी रहेले त चड्ढी आ फराक में समेटाइल बटोराइल रहेले. जेंव जेंव ऊ बढ़त जाले ओकरा प देह दिखावन के सीमा, जवन हमनी के समाज तय कइले बा, लागि जाले. ऊ खाली आपन एड़ी आ मूड़ी उघार राखि सकेले, उहो हिन्दू धरम के मोताबिक. मुसलमानी धरम के मोताबिक ओकरा आपन मूड़ियो तोप के राखे के रिवाज बा. लइकी जखनी सयान होके बिआह के बन्हन में बन्हा जाले त ओकरा आपन संउसे देहि लोग का नजर से बचा के राखे के पड़ेला. यानि की पूरा के पूरा देहि कपड़ा से तोपाइल.

खैर इ त हमनी के देस के संस्कृति ह, सभ्यता ह. जेकरा के हमनी के अपना पुरखा पुरनिया के दिहल तोहफा के रुप में अपनवले बानीं जा आ एही में आपन बड़प्पन बुझिलां जा. बर्व महसूस करींला जा. बाकिर नयका पीढ़ी अब लकीर के फकीर बनल आ अपना पुरखा पुरनिया केबतावल राहि प चले में आनाकानी करत बा, पगहा तुड़ावत बा.

विकास के मतलबे होला आगे मुंहे बढ़ल. विकास के इ माने अब आन बेर के हो गइल. एह घरी एकर माने साफे बदल गइल. अब विकास के माने पाछे हटल, बड़हन से छोटहन रुप धइल हो गइल बा. हमनी के पुरखा पुरनिया पहिले नदी तालाब के पानी पीअत रहे. बाकिर जइसे जइसे उनुका लोग के दिमाग के विकास भइल भा इ कहीं कि इनिका लोग के अकिल के केंवाड़ी तनी फांफर भइल, इ लोग ओह नदी तालाब के पानी समेटि के कुईंया में क दीहल आ लागल ओकरे पानी धोंके. अउरी विकास भइल आ कुईंया से ना फरिआइल त ओह कुईंया के पानी के लोग चापाकल में ढूका दीहल आ ओकरे से पानी पीअे लागल. विकास के रफ्तार रूकल ना, चलत रहल. चापाकल के पानी आउरी पातर पाइप में ढूकि के टंकी में हेलि गइल. अतना के बाद लोग सोचल कि चल अब काम फरिआ गइल. बाकिर ना. इनिका लोगन का दिमाग का खूराफाती कारखाना में डिजाइन डिजाइन के फारमूला तइयार होत रहल आ ऊ पानी देखते देखत दीया वाला जिन्न लेखा बोतल में हेलि गइल आ फ्रीज के राहि पकड़ि लिहलस. अतनो प लोग के संतोष ना भइल. लोग सोंचल कि पानी खातिर फ्रीजके दन्तजाम कहां कहां होखी ? एहसे लोग पानी के पाउच में बन्द क के बगली में, झोरा में, अटैची में लेके चले लागल ताकि जब मन करी, जहवां मन करी, ओहिजे सरकारी दारू के पाउच लेखा दांते नोचि के घटाघट घटक जाइब, झुराइल देहि तरि हो जाइ, मन हरिअर हो जाइ, ओठ प के फेंफड़ी झुरा जाइ.

रउआ सभे अब इहे सोचत होखब कि ई हंसुआ के बिआह में खुरपी के गीत काहे गावे लगलन ? बकत रहलन कुछ आ बके लगलन कुछ अउर. बतकही बतकूचन होति रहे फुल आ हाफ पैन्ट के. एह में कुईंया  तालाब, टंकी पाउच इ सभ केने से जहुआइल आके दाल भाति में ऊंट के ठेहनु लेखा लउके लगलन स ? तनी सा सबुर राखीं. तनी करेजा कड़ा कइले रहीं. मरद मानुख के अकुताई ना सोहाय. ठहरीं, हमरा के तनी ई सभन के जवरिया लेबे दींही. रउआ आंखि के सोझा एकएक गो बाति परत दर परत खुलत चल जाई.

हं, त हम कहत रहीं कि आदमी सयान भइला प आपन संउसे देहि तोपि लेबे के चाहेला. जमाना बदल गइल. अब त लोग आपन संउसे टंगरी तोपे में अंउजाये लागत बा. पहिले केहू के मुंह तोप दिआत रहे तब ऊ उजबुजात रहे. अब ऊ टंगरिये तोपे में उजबुजाये लागत बा. आदमी का विकास का संगे जइसे पानी आपन रुप आकार बदलत चलि गइल ओसहीं आदमी के कपड़ो रुप आकार बदलत चलि गइल. जइसे जइसे पानी के आकार छोट होत गइल ओइसहीं आदमी अपना कपड़ो के लम्बाई चौड़ाई छोट करत चलि गइल.

लइका से लेके सयान, बूढ़ से लेके जवान सभे आपन विकसित रुप के लोग के सोझा परोस रहल बा. विकसित समाज में अविकसित रहल विकास के नजरिया से अनुचित कहाई, उचित ना. मरद आ मेहरारू के भारतीय संविधान से मिलल बरोबरी के अधिकार के उपयोग आ उपभोग करत जनानी समुदाय के सदस्या लोग अपना आप के एकरा से बरी ना क के मरदाना समुदाय के सदस्यन जवरे डेग से डेग मिलावत चलि रहल बा. मरदानी डिपाट हाफपैन्ट में आ चुकल बा त जनानियो डिपाट के लोग आपन पूरा ड्रेस के हाफ क के स्कर्ट में बदलि के आपन अधिकार के उपयोग आ उपभोग करि रहल बा. जहवां बाति बरोबरि के रहेला ओहिजा भेदभाव नीक ना होखे. एही से जनाना डिपाट के लोग मरदाना डिपाट से पाछा नइखे रहे के चाहत.

पैन्ट के पहिला अवस्था जवन आदमी के सयान भइला प फुलपैन्ट रहे तवन विकास के दोसरा खेंड़ी प हाफपैन्ट का रुप में आ गइल बा. तीसरका खेंड़ी प जब चंहुि प त चड्ढी भा लंगोटी का रुप में लउकी. चउथा खेंड़ी प चहुंप के ई कवना रुप में लउकी ? ई त रउरा खुदे समुझि सकत बानीं. एकरा बारे में रउरा हमरा से जादे बताइब भा समुझाइब. काहे कि रउओ एही विकसित देस के विकसित समाज के विकसित दिमाग के विकसित आदमी बानीं. हाफपैन्ट पहिन के चलीं. फुलपैन्ट मे काहे अझुराइल बानीं ? तनी उघारि के चलीं. तनी हवा लागे दींही ना त ..... !
--------
अनाईठ, प्रसाद पेपर वर्क्स लगे,
भोजपुर - 802 301

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  दिसम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

महर्षि भृगुमुनि आ ददरी के मेला

पर्यटन विषयक लेख

महर्षि भृगुमुनि आ ददरी के मेला

 

 - दयानन्द मिश्र नन्दन


आजु जवन मनवन्तर चलि रहल बा तवना के नाम बैवस्वत मनवन्तर ह. ई सातवां मनवन्तर ह. एकरा पहिले सिलसिलेवार से स्वायम्भुव, स्वरारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, आ चाक्षुष मनवन्तर रहे. छठवां मनवन्तर चाक्षुष में सात गो तपोनिष्ठ ऋषि - भृगु, नभ, विवस्वान, सुधामा, बिरजा, अतिनामा, आ सहिष्णु - रहलन. एहि सात जाना पर ‘सप्तऋषि’ नाम धराइल. ओईसे त बहुते ऋषि रहलन बाकिर योगबल, तपबल, साधबल, भा यज्ञबल में एहलोग के स्थान बहुत उपर रहुवे. एहू सात ऋषियन में महर्षि भृगु के नाम पहिलका रहे.एह लेख में हम ओही भृगु ऋषि के चरचा करे जात बानी.

छठवां मनवन्तर चाक्षुष के शुरूआत हो गइल रहे. नाना तरह के विघिन डाले वाला राक्षसन के उतपात खूब होत रहे. हर प्रकार से, हर तरह से राक्षस आपन प्रभाव देखा के धरम के काम पूरा ना होखे देसु. जगह जगह ऋषि मुनि लोग के परेशानी बढ़ल जात रहे. अपना अपना योगबल से राक्षसन के परभाव कम करत कवनो तरह से ऋषि लोग के यज्ञ पूरा होत रहे. ऋषि मुनि लोग के जियरा बड़ा सांसत में पड़ल रहे. उ लोग कवनो तरह से आपन यज्ञ पूरा करे.

जेकर हाथ पैर आ मन काबू में रहेला आ जेकरा में विद्या, तप, आ कीर्ति के समावेश भरपूर रहेला उ धरती पर नाना तरह के बिघनन के सामना करियो के आपन काम बढ़िया तरह से पूरा करत, सतकरम करत आगे बढ़त जाला. भृगु ऋषि में सब गुण भरल रहे. उनकरा अन्दर विद्या, तप आ कीर्ति के उर्जा भरल रहे.

जे सैकड़न साल हवा पी के, एक पैर पर खड़ा होके, दूनो हाथ उपर उठा के तपस्या में लीन रह सकेला उ कठिन से कठिन संकल्पो के पूरा कर सकेला. भृगु ऋषि अइसने रहलन. तबे नू सातो ऋषियन में पहिला नाम उनकरे बा.

ओह घरी विष्णु भगवान के पूजा सब केहू बड़ा नेह लगाके करत रहे. उहे भगवान विष्णु एकदिन मां लक्ष्मी के साथ क्षीर सागर में सुतल रहलन. मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के गोड़ दबावत रहली. ओहि समय भृगु ऋषि खिसियात ओहिजा पंहुचलन. उनका एह बात के खीस रहे कि विष्णु उनकर एगो आदेश ना मनले रहलन. पंहुचते ऊ विष्णु भगवान के छाती पर लात जमवलन. विष्णु भगवान के नींद टूट गइल आ ऊ भृगु ऋषि के चरण पकड़ के कहलन कि, - हे मुनिवर, कहीं हमरा पत्थर लेखा छाती से रउरा कमलवत चरण के बड़ा चोट पंहुचल होखी. आंई सुघरा दीं.

भगवान विष्णु के अतना कहते ऋषि के आंख खुलि गइल. परदा हटि गइल. अज्ञानता के नाश हो गइल. ज्ञान के प्रकाश पड़तहीं ऋषिवर दूनू हाथ जोड़िके भगवान विष्णु के चरण पर गिरि पड़लन. कहलन कि हे प्रभो! हमरा से बहुत बड़ अपराध हो गइल. ई अपराध अज्ञानतावश भइल बा. हमार अपराध के रउरा क्षमा कर दीं.

रहिम के शब्दन में देखीं : ‘‘क्षमा बड़न को चाहिये छोटन के अपराध, क्या घट गया रहीम का जो भृगु मारी लात ?’’ भगवान विष्णु भृगुमुनि के समझवलन आ एगो कईन के लकड़ी देके कहलन कि गंगा किनारे चलत चल जा. जहवां सांझ हो जाव रुक जइहऽ. एह कोईन के लकड़ी के गाड़ दीहऽ. भोरे होखला पर जहां ई कोईन हरिअर हो जाव ओहिजे तू आपन आसन जमा दीहऽ आ तपस्या करीहऽ. तू बहुत बड़ यश के भागी बनबऽ.

महर्षि भृगुजी ओह लकड़ी के लेके चलि दीहले. चलत चलत राहे में एगो तपस्वी से भेंट हो गइल. ओह तपस्वी के नाम दरदर मुनि रहे. दरदर मुनि अपना से महान तपस्वी से भेंट भइला पर बहुत खुश भइलें आ भृगुजी से अपना के शिष्य बनावे खातिर निहोरा कइलें. बहुत निहोरा पर आ मन, वचन, कर्म से पवित्र समुझि के दरदर मुनि के आपन शिष्य बना लिहलें. अब दूनो जना गुरू शिष्य फेर गंगा के किनारे किनारे चल दिहलें अपना यात्रा पर.

चलत चलत बलिया नगरी में गंगा के तट पर रात हो गइल. सूखल लकड़ी गाड़ के गुरू शिष्य स्नान, संध्या, वंदन कर के सूत गइल लोग. भोरे जगला पर आश्चर्य के सीमा ना रहे. जवन कोईन के लकड़ी कतहीं हरियाइल ना रहे ओह लकड़ी में एगो मुलायम पात अंखुआइल रहुवे. ओह दिन कातिक के पूरनमासी रहे. एही वजह से हर साल कातिक सुदी पूरनमासी के गंगा नहान कइके भृगुमुनि के दरशन कइल आ जल चढवल़ा के महातम मानल जाला. एही चलते ददरी के मेला लागेला जवन दरदर मुनि के नाम पर बा.

विष्णु भगवान के निर्देशानुसार भृगु मुनि बलिया के दखिन गंगा किनारे तपस्या में लीन हो गइलन आ दरदर मुनि उनका सेवा में लाग गइलन. ओह घरी आजु के बलिया से नव दस किलोमीटर दखिन पर गंगा बहत रहली. धीरे धीरे गंगा का कटान से बलिया उत्तर का तरफ हटत गइल. अबहीं के बलिया तीसरा जगहा पर बसल बा. एह क्षेत्र के भृगु क्षेत्र कहल जाला आ कातिक पूरनमासी के एगो बड़हन मेला ददरी मेला के नाम से लागेला. एह मेला में दूर दूर से मरद मेहरारू आवेला लोग आ गंगा नहान अउर भृगु जी के दर्शन पूजन कइके आपन आपन मनोकामना पूरा करे खातिर मनौती मानेला लोग.

कातिक सुदी चतुर्दशी से अगहन बदी एकम तक भृगु बाबा के मंदिर में साधु सन्यासी के बड़हन जमावड़ा होला. ददरी मेला में जनावरन के बड़हन मेला लागेला जवना में दूर दूर से पशु व्यापारी आपन आपन पशु लेके जुटेले आ जिला जवार का अलावा दूरो दूर से किननीहार आवेलन. प्रशासन एह मेला में
पूरा ताकत से जुटेले. मेला में हर तरह के सामानन के दूकानन का अलावा सांस्कृतिक आ साहित्यिको आयोजन मजगर होला.
------

ग्राम: दिघार, बलिया - 277001

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  दिसम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

अयनक में

 कविता

अयनक में

- रामनिवास वर्मा ‘शिशिर’



अयनक में
ना देखे
आपन कोई चेहरा.
देखेला ओकर चेहरा
जे दिल में
बइठल रहेला .
ना सवांरे
आपन सूरत,
सवांरेला
ओकर सूरत,
जे दिल में
बइठल रहेला .
झेल लेला दरद,
भूल जाला गम,
ओकरा खातिर,
जे दिल में
बइठल रहेला .
तनहाई में जिनिगी
गुजार लेला,
भीड़ लेखा
ओकरे खातिर
जे दिल में
बइठल रहेला .
रो के हंस लेला,
खो के पा लेला,
मर के जी लेला,
ओकरे खातिर
जे दिल में
बइठल रहेला .
-------

ब्रहमपुर, बक्सर, पिन - 802112

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  नवम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

एहसान

 कहानी

एहसान


- डॉ श्रीप्रकाश पाण्डेय

इ बइठक साधारण ना रहे. सत्ताधारी पार्टी के मुखिया अउरी उनुकर सब विश्वासी लोग बड़ा गम्भीर मुद्दा पर बातचीत करत रहे लोग. वइसे त उनुकर सरकार चार साल से चलत रहे अउरी पांचवा साल में चुनाव होखे के रहे. समस्या इ ना रहे कि चार साल में सरकार के काम काज निमन रहे कि बाउर, समस्या इहो ना रहे कि अगिला साल ओट में जीत मिली की हार. समस्या इ रहे कि अगर नेताजी फेरू मुख्यमंत्री ना बनब त का होई ?

इ समस्या मुख्यमंत्री के विश्वासी लोगन के सेहत से कवनो सम्बन्ध ना राखत रहे. इ त नेताजी के ‘परसनल’ समस्या रहे. लेकिन  विश्वासी चमचवनी के आपन विचार व्यक्त करे के मोका मिलल रहे त उ बड़ा गम्भीर मुद्दा बनवले रहले स. जइसे कि सामने प्रलय आवे वाला होखें अउरी इ ओह प्रलय से बचाव के राहता खोजत होख स.

एह बैठक में पांचे आदमी रहले. एगो खुद नेताजी, जवन चार साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री रहलन, दोसरका उनुकर हमजात व्यक्तिगत सचिव. तीसरका उनुकरे पार्टी के कोषाध्यक्ष. चउथका उनुका पाटी के प्रदेश अध्यक्ष आ पांचवा उनुकर भाई, जे अभी पनरह दिन पहिले एगो मेहरारू के बलात्कार अउरी ओहकर हत्या कइला के बादो मजा से घुमत रहले.

चार साल के सरकार चलवला में प्रदेश बीस साल पीछे चलि गइल रहे, इ उन्हन लोग खाती कवनो समस्या ना रहे. चार साल में अपराध में तीन गुना विकास भइल रहे, इ ओह बैठक के कवनों मुद्दा ना रहे. चार साल में प्रदेश के बिजली, सड़क, स्कूल अउरी रोजगार के सब व्यवस्था तहस-नहस हो गइल रहे, इहो कवनों बड़ बात ना रहे. चार साल से प्रदेश में गुण्डा राज चलत रहे, एह बात के कवनों चिन्ता नेताजी के ना रहे. चार साल में कतना किसान आत्महत्या कइले रहले, इ कवनो समस्या ओह बइठककर्ता लोग के ना रहे.

चार साल में प्रदेश में जवन भइल, तवन प्रदेश के लोग के बरबाद करे वाला काम भइल. इ कवनो ध्यान देबे वाला बात ना रहे. चार साल में नेता जी के पार्टी के लोग जवन मन कइल तवन नेताजी के आदमी होखला के नाम पर कइल, लेकिन नेताजी के ओह से कवनो परसानी ना रहे. त फेरू परसानी काथी के रहे?

बइठक में मुख्यमंत्री के सचिव जी बोलल शुरू कइले - ‘जइसन की रउआ सब जानतानी कि अगिला साल ओट होखे वाला बा. इ जरूरी नइखे कि जनता हमहनी के जिताइए दी. काहें से कि लोकतन्त्र में जनता बे पेनी के लोटा होली स. आजू रउआ संगे बिया काल्हू केहू अउरी के संगे होई जाई. चुनाव में हार-जीत नेताजी के कवनों समस्या नइखे, काहें से कि ओकर ठीका बाहर के लोगन
के दिया जाई. ओह खातीर नेताजी आपना खास अधिकारियन के ड्यूटी में लगा देबि. आ फेरू चुनाव चार साल बाद बावे ओकर चिन्ता करे खातीर हमनी के नइखीं जा बइठल. जइसन की रउआ सब जानतानी कि नेताजी कतना गरीब परिवार से रहनी आ इहां के बाबूजी खेत में मजदूरी कइले.........’

‘चूप ना रह सचिव. तहरा से इहे पूछाता कि नेताजी के बाबूजी का रहनी ? उहां के उपर कइगो हत्या बलात्कार के केस बा ? तू मेन बात बताव.‘ - मुख्यमंत्री के सचिव के बात काटि के प्रदेश अध्यक्ष फूफकरले.

‘हमार इ मतलब नइखे. हम चाहतानी कि रउआ सब मए बात ठीक से समझि जाई.’

‘त तू ई कहल चाहतारऽ कि जे गरीब होला ओकर लइका मुख्यमंत्री ना होले स.’ - नेताजी के भाई गरम होई गइले.

‘तू चूप रहऽ. जब तक पूरा बात समझि में ना आवे तब तक कहीं टांग ना अड़ावल जाला.’ - नेताजी आपन भाई के समझवले.’ अब हमरे सब बात बतावे के परी. इ ठीक बा कि हमार जीवन खुलल किताब हवे आ ओकरा के रउआ सभे खूब पढ़ले बानी. फेरू हम ओह के दोहरा देत बानी.‘

नेता जी आपन कहानी बखान करे लगलें -

‘बात ई ओहिजा से शुरू होखल जब हम दस बरिस के रहनी आ मुन्ना दू बरिस के.’ - नेता जी अपना छोटा भाई के एहि नाम से पुकारत रहनी.

‘ओह दिन हम बेमार पड़ल रहनी आ माई-बाबूजी हमरा खटिया के लगे हमरा ठीक होखे के आशा लेके बइठल रहल लोग. तबियत में कुछ सुधार रहे तबे गांव के धनिक हमरा घरे अइले आ हमरा बाबूजी से कहलें कि का रे शिवधनिया, आजू का करत रहले हा कि काम प ना अइले ह ? ’

‘ओइसे त उ धनिक आदमी के उमिर हमरा बाबूजी से कमे रहे, लेकिन बाबूजी हाथ जोरी के कहले कि मालिक लइका के तबियत खराब रहल ह, ओहि बिपति में फंसि गइल रहनी हा. आतना सुनला के बाद उ धनिक कहले कि तोरा अपना लइका के फिकिर बा आ हमार काम के नइखे ?’

‘ई बात नइखे मालिक.’

‘त कवन बात बा ?’

‘मालिक हमार लइका............’

‘चूप. चलू हमरा संगे आजू ढेर जरूरी काम बावे.’

‘लइका के छोड़ि के ?’

‘हं.’

‘ना मालिक अइसन मति करीं.’

‘ते ना चलबे ?’

‘ना.’

‘बाबूजी के अतना कहते उनुकर लात-मुक्का से स्वागत शुरू हो गइल. उ तब तक ओह धनी आदमी के लाख प्रयास के बादो लात खात रहि गइले जब तक कि उ हांफे ना लागल.’ - ई कहि के नेताजी के आंखि डबडिया गइल. माहौल गमगीन हो गईल. आंखि पोछि के नेताजी फेरू शुरू हो गईलन -

‘हम पढ़े में तेज रहनी लेकिन पेट भरे के काम आ पढ़ाई एक संगे ना चलित. लेकिन तबो हम हिम्मत ना हरनी. दुख त एह बात के रहे कि उ आदमी अक्सर बाबूजी के मारे. एक दिन इहे होत रहे त उ हमरा से बरदास ना भइल आ लेहना
काटे वाली गड़ासी से ओह आदमी के गरदन काटि दिहनी. चौदह बरिस में पहिला खून. तब से कहां के पढ़ाई ! एगो ई धन्धे शुरू हो गइल खून करे के.

हमरा लगे एक से एक नेता लोग के बुलावा आवे आ हम उन्हन लोग के जीतावे के ठीका लीहीं आ आपना गिरोह  के आदमी से बूथ कैप्चरिंग करा के जीतवाईं.

एगो समय अइसन आइल कि हमार जीतवावल चालीस पचास के करीब विधायक जीते लगलें. हमरा के पईसा, लईकी देबे के, आ कानून से बचावे के काम ओहि नेतवन के रहे. लेकिन ई कब तक चलित. इ बात हमरा समझि में आ गइल कि हमरा जीतववला से इ विधायक मंत्री बनि सकेलन स त हम काहें ना ?‘

नेताजी कुछ देरि सांस लिहनी, बाकिर चारो आदमी एह रूप में नेताजी के बात सांस रोकिके सुनत रहे लोग जइसे कवनो जासूसी धारवाहिक देखत होखस लोग.

‘एकरा बाद जवन भइल ओकरा से रउआ सभ परिचित बानी. अब हम मेन बात पर आवऽतानी. राजनीति में आके हम विधायक, मंत्री, आ मुख्यमंत्री तक पहुंच गइनी. मुख्यमंत्री के रूप में तबादला, कमीशन आ कई तरीका के गलत काम से हम अरबो रूपिया कमइनी. बस इहे रूपिया हमरा चिन्ता के जरि बा.

‘भइया हमरा तहार बात समझि में नइखे आवत रूपया तहरा के काहें परसान कईले बा.’ - मुन्ना कुछु ना समझले.

‘मुन्ना बात ई बा कि केन्द्र सरकार हमरा सेे टेढ़ नजर राखेले आ ओकरा जब मोका मिली हमार सरकार के बरखास्त कइके राज्यपाल के देख-रेख में ओट करवाई. तब जरूरी नइखे कि जवन हमनी के चाहबि जा तवने होई. अगर दोसर सरकार आई त एह धन के लुकवावल मुश्किल हो जाई.’

एका-एक जइसे सब नींद से जागल आ आपन माथा पीट के लगभग समवेत आवाज में बोलल लोग कि ई बात त हमनी के समझिए न पवनी हा जा.’

‘अब समझि में आ गइल होखे त रउआ सब एह धन के सुरक्षित करे के कवनो उपाई बताईं.’

बइठक में चुप्पी छापी लिहलसि. सब आपन-अरपन दिमाग खपावे लागल. लगभग पनरह मिनट के चुप्पी के बाद नेताजी के नीजि सचिव बोलले कि - ‘श्रीमान एगो उपाई बा कि ओह धन के अधिकांश हिस्सा सफेद बना दिहल जाई.’

‘लेकिन एह में बहुते धन टेक्स में चलि जाइ.’ - कोषाध्यक्ष आपन चिन्ता प्रकट कईलन.

तले प्रदेश अध्यक्ष बोलले - ‘आ फेरू इ समस्या बा कि आतना धन आइल कहां से ? इ कइसे देखावल जाई ?’

‘इ समस्या के समाधान हमरा लगे बा. पहिले नेता जी तैयार होखीं तब !’

नेताजी कुछ सकुचइले, सोचले, फेरू मुह खोलले - ‘इ बात ठीक बा कि जब तक
हम्हनी के सरकार बिया जवन मन करऽता करत बानी जा. लेकिन काल्हू के देखले बा ? अगर बात टैक्स दिहला के बा त जेल गइला आ पइसा छिनइला से अच्छे नू बा. हमरा तहार विचार नीक लागत बा. तू आपन योजना के खुलासा करऽ.’

‘नेताजी के लगे जतना धन बा ओकर खुलासा करे के एगो उपाई बा कि आजुए से नेताजी पूरा प्रदेश के तूफानी दौरा करीं. हर बलाक, हर कस्बा, इहां तक कि हर गांव में सम्भव होखे त राउर कार्यक्रम लागे. ओह पार्टी में कार्यक्रम में इ पहिले से घोषणा होखे कि रउआ पाटी के लोग रउआ के चन्दा दी. उ चन्दा त नाम मात्र के रही. रउआ चाहीं त मंच से लाखन रूपया के घोषणा करि सकेनी. आ फेरू दू महिना बाद राउर जन्मदिन बा. ओह जन्मदिन में राउर पार्टी के विधायक, मंत्री, जिलाध्यक्ष आदि से चन्दा मांगी. चन्दा मिले कम ओकर सरकारी घोषणा अधिक होखे. इ अब राउर मर्जी कि रउआ कतना के टैक्स देत बानी आ फेरू उपहार के देता, कतना देता, एकर हिसाब के राखेला ?‘

इ कहि के निजी सचिव विजई मुद्रा में सबके देखले. सब हल्का सा मुसुकाइल आ सबके नजर नेताजी पर टिक गइल. नेतोजी मुसकइलें.

सब कुछ ठीक हो गइल. एह काम में ध्यान देबे वाली बात ई रहे कि नेताजी के देशभक्ति मुअल ना रहे. एकर प्रमाण इ रहे कि उ अउरी लोगन नियर आपन धन ‘स्वीस’ बैंक में ना रखले. नेताजी के ई एहसान देश पर हमेशा रही.
----

डॉ श्रीप्रकाश पाण्डेय,
एमए, पीएचडी, त्रिकालपुर,
रेवती, बलिया, उ.प्र.

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  नवम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

देवी गीत

 देवी गीत

- कृष्णा नन्द तिवारी

(उर्फ किशन गोरखपुरी)

माई शेरावाली क पूजिला चरनियां
कि सुति उठिना .
माई दीहितीं दरशनियां कि सुति उठिना,
हो कि सुति उठि ना ..
लालि रंग चुनरी आ नारियल चढ़ाईला.. .
माई के दुअरिया पे सिरवा झुकाइला ..
माई लेहड़ावली क धरीला शरनियां,
कि सुति उठिना .माई दीहितीं दरशनियां 0
धूप-अगरबतिया ले माई के देखाइला .
रउरे मंदिरवा में असरा लगाइला..
माई विन्ध्याचली जी के करीला भजनियां,
कि सुति उठिना. माई दीहितीं दरशनियां 0
नवरात्रि माई के पूजन जे करावेला .
मय पाप कटि जाला,
सुखी जीवन पावेला ..
गावेलन ‘किशन’ माई सगरी कहनियां,
कि घूमि-घूमिना .
माई दीहीती दरशनियां कि सुति उठिना,
हो कि सुति उठिना ..
----

कृष्णा नन्द तिवारी,
पुलिस चौकी, सतनी सराय, बलिया.कहानी
(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  नवम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)



झाह में जिनगी

 नयका कविता

झाह में जिनगी


- मलयार्जुन



शोर बा
मयना के मारण मंत्र क
डहर भुलाइल
लउर के हूरा
जूरा बान्हे
पर्स में राखत
मोबाइल
झीन
बीच बजरिया
देखा
बतियावत
केसे
जे पेंदी का हीन
बे पानी
कस ना मानी
नूर नुक्सा से गायब
कबले भौंह रंगाई
छेंकल बुढ़ापा राह
झाह में जिनगी
आग का खोरी
सुनी नु प्रलाप
के के रास्ता मिलल
फोफर.
---
मलयार्जुन,
वरिष्ठ मनोरंजन कर निरीक्षक, बलिया

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  नवम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)