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रविवार, 16 मार्च 2025

कबो चर्चा नाही होला ...

 गजल

कबो चर्चा नाही होला ...



शिवानन्द द्विवेदी सहर

हम वफ़ा करके भी दागदार हो गइलीं
आ उनका बेवफाई के कबो चर्चा नाही होला !

उनका हर मुस्कराहट के ज़माना का खबर रहे
हम उनका याद में रोंई तबो चर्चा नाही होला !

ऊ हमार नाम हथेली पर लिखि के मिटा दिहली
हम खुद ही के मिटा दिहली तबो चर्चा नाही होला !

ऊ हमार ग़ज़ल पढि के अक्सर मुस्करा देली
हम आंसू रोज़ बहावेनी तबो चर्चा नाही होला !

उनके खातिर सारा रिश्ता छोड़ दिहली हम
ऊ हमके छोड़ भी दिहली तबो चर्चा नाही होला !

उनके आपन बनावे में हम सब कुछ भुला दिहली
ऊ हमके ही भूला दिहली तबो चर्चा नाही होला !

हम उनका ज़ख्म पर मरहम लगवनी हरदम
ऊ उल्टे जख्म बरसवली तबो चर्चा नाही होला !

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शिवानन्द द्विवेदी सहर, सुपौत्र श्री नन्द लाल दुबे, ग्राम + पोस्ट - सजावं, थाना - लार, जिला - देवरिया (यू. पी.)

सोमवार, 13 जनवरी 2025

दोहा

कविता

दोहा


- बद्रीनारायण तिवारी शाण्डिल्य



माया पगरी माथ पर, बन्हले घुंघरू पांव ,
जोहत जेठ लुवार में, दहकत शीतल छांव.

उठल पच्छिमी छितिज से धुंध भरल बातास,
उबचुभ हो अफना रहल, अब पुरुबी आकास.

लाख जतन केहू कइल, पानी पड़ल ना रेख,
कबहूं कहां मिटा सकल, ब्रह्मा के अभिलेख.

बाप कटोरा हाथ में, अबस पुकारसु राम,
बइठि बहुरिया बगल में, मरद थम्हावे जाम.

जनखा डफलि हाथ में, दिहलसि कतने ताल,
कुछउ हासिल ना भयल, बहुत बजवलसि गाल.

सोन चिरइया देहरी, फेंकलसि चाभी झोंझ,
सूतल मनुवा आलसी, कइलसि देहि न सोझ.

पिछुवारा पहरू ठनकि, कइलसि सबइ सचेत,
अब पछितइले का होई, चिरई चुगलसि खेत.

आजु काल्ह के पहल में, चुकल जवानी जोस,
दांत टुटल, चमड़ी झूलल, का कइला अफसोस.

जोति खेत क्यारी बनल,रोपलसि धान किसान,
पानी बिनु बिरवा झुलसि, भऽइल सांझि, बिहान.

अंगनइया में जमल बा, अब हिंजड़न के भीड़,
प्रजातन्त्र के ताल में, केने फुटी भंसीड़.
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213ए राजपूत नेवरी, बलिया 277001

(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

का हम खुशी मनाईं

 का हम खुशी मनाईं


- त्रिभुवन प्रसाद सिंह प्रीतम



स्वागत ए छब्बीस जनवरी तोहरा पर बलि जाईं.
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?

घर में भूंजल भांग ना लउके, छउके मूस चुहानी.
कुक्कुर सूंघे छूंछ कंहतरी, फेंकल फिरे मथानी .

खाली पेट खराइल, भूक्खन नारा कवन लगाईं ?
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?

मेहरी के तन फटही लुगरी, कतना पेवन साटे.
जेकर करजा बा कपार पर, टोके राहे घाटे.

बीया, पानी, खाद, लगान के कईसे जुगुत लगाईं ?
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?

बबुआ कहलसि बाबूहो, हमके डरेस बनवा दऽ.
किरमिच वाला चउचक जूता जल्दी से मंगवा दऽ.

टका टेट के टा टा कहलसि, कइसे के समुझाईं ?
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?

नेताजी त भासन में राशन के बिछिली कईलें .
आशाके झांसा दे दे के, ऊ अपने दिल्ली गइलें.

ऊ संसद में चानी काटसु, हम छछनी छिछिआईं.
ठाला में पाला मरले बा, का हम खुशी मनाईं ?
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शारदा सदन,
कृष्णानगर, बलिया 277 001
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)


सोमवार, 6 जनवरी 2025

हम गीत अमन के गाइला

 कविता

हम गीत अमन के  गाइला


- सुरेश कांटक



जब जब आकाश उदासेला,
हर राह अन्हरिया में होला,
हम आपन दिया जर्राइं ला,
हम गीत अमन के गाइला.

जब बाज झपट्टा मारेला,
बिखधर के फन फुफकारेला,
चिरईन से सांस मिलाईला,
हम गीत अमन के गाइला.  

होरी में धनिया रोवेले,
रो रो  के दुखवा धोवेले,
हम गोबर के गोहराईला,
हम गीत अमन के गाइला.

धरती जब फूंका फारेले,
कुंहंकत कोईल जब हारेले,
हम आपन कलम उठाईं ला,
हम गीत अमन के गाइला.

सागर में आगि लहक जाला,
गागर में बाति बहकि जाला,
हम बहकल के बहलाईं ला,
हम गीत अमन के गाइला.

जब बाघ बकरियन के खाला,
जब दूध बिलरिया पी जाले,
बछरन के नीन भगाईं ला,
हम गीत अमन के गाइला.
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कांट, ब्रह्मपुर, बक्सर - 802 112
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

रविवार, 29 दिसंबर 2024

दू गो गजल

 दू गो गजल


- पद्मदेव प्रसाद ‘पद्म’


(एक)



 कल तक रहल जे पावा, उ सेर हो गईल.
 निपटे रहल गंवार जे, अहेर हो गईल .

भांजत रहल जे हरदम, छाती उठाइ के.
देखत मतर में बाज से, बटेर हो गईल..

झोली जे हाथ ले के, घर घर घूमत रहे.
झेपते पलक के, बिड़ला कुबेर हो गईल..

ताकत से जे कि अपना, ढकले रहे गगन.
मउवत का पांव खींचते, ऊ ढेर हो गईल..

आसन पर ऊंच बईठल, जे कि रहे धधात.
लुढ़कते जमीं पर, गउरा गंड़ेर हो गईल..

के बा समर्थ अईसन, जे ना उठल गिरल.
राजा रहे जे कल तक, ऊ चेर हो गईल..

( दू )


सबुर बाटे हमके गिरानी से अपना.
सबुर बाटे टूटल पलानी से अपना.

अब सबुर के सिवा बाटे रह का गईल.
सबुर बाटे घीसल जवानी से अपना.

कुछ बतवनी, छिपवनी भी उनुका से हम.
सबुर बाटे बीतल कहानी से अपना.

दर्द आपन सुनाके हम कर का सकीं.
कहल कुछ ना चाहीला बानी से अपना.

सबे बाटे जानत बतावे के का बा .
लुटाईं ना राहे पर पानी के अपना.

लिखके कविता कहानी गजल जात बानी.
सबुर बाटे एही निशानी से अपना.

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बुढ़नपुरवा, बक्सर, बिहार
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(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004  में अंजोर भइल रहल)

जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी,

 गीत


- देव कुमार सिंह


(एक) जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी,


 

जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

खालि खाए खातिर जिनिगी धिक्कार भाईजी.

जब पुण्य अनधा जुटेला, नर तन तबहीं मिलेला,
सेवा तप करऽ उपकार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

ई जग हवे एगो डेरा, स्थायी ना हवे बसेरा,
काहे करेलऽ तकरार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

जे जिनिगी पेट पोसे में गंववावल,
देशवा के जे शान ना बढ़ावल,
ओकर जिनिगी धरतिया पर भार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

आपस के भेद सब मिटावऽ,
सबके गलेसे लगावऽ,
बांटऽ दंनिया में सुख शान्ति पयार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

भूखड़ा के भोजन करावऽ,
नंगा के वस्त्र पहिरावऽ,
तबे होई तहार जिनिगी साकार भाईजी,
जिए के जिएला कुकुरो सियार भाईजी.

(दो) कब होई देशवा में भोर

 

कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?
सुख के सुरुज कब होइहें उदितवा,
कब होई इहवां अंजोर ?

देशवा आजाद भईल, अइसन सुनाइल सबके,
सुखी गांव नगर होई,
अइसन बुझाइल सबके.
पड़ल मेहनत के अंखिया में माड़ाऽ.,
ढर ढर ढरकेला लोर,
कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?

आकि ई आजादी बबुआ,
टोपी में भुलाइ गइल,
आकि सब सेठवा तिजोरी में लुकाइ लिहलें,
आकि उहो बाड़े अभी लरिका गोदेलवा,
चललें ना झोपड़ी का ओर,
कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?

आकि इ मगन बाड़ें कुरुसी का खेल में,
आकि नौकरशाही इनके
डालि दिहलस जेली में,
अंखिया फोड़ाई गइल इनका जनमते,
आकि भइलें ना अभी अंखफोर,
कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?

आकि पनरह अगस्त रहे सुनर सपनवा,
अधनीनीये में भइल सुरुज दरसनवा,
उरुआ बोले, चमगादड़ उड़ेला,
अभी बाटे अन्हार खूबे घनघोर,
कब बीति दुख के अन्हरिया हो रामा,
कब होई देशवा में भोर ?
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प्रवक्ता, इन्टर कालेज, जमालपुर
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

लोरी : चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला

 कविता

लोरी : चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला


- सुरेश कांटक



चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला,
राजा जी का राज में पड़ल बाटे पाला.

तेल चढ़ल ताड़ प, आकास में मसाला,
अदिमी बेकार, रोजगार ना भेंटाला.

टोपिया बा टप प, किसान जहर खाला,
चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.

चुप रहऽ, चुप रहऽ, मिलि गइल बालू,
सभ धन घोंटि गइल कालू जी के भालू.

हमनी के गुदड़ी, आ उनुका दोसाला,
चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.

बइठल निठाला, हमरा पंउवा में छाला.
पेटवा प पाला डाले, मुंहवा प ताला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
कांटक कहेले ओकर आका बाड़ें काका,

अपना सवादे बन करे नाका नाका.
लेबे खातिर धरती, मचवले बाटे हाला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
जलदी सयान होखऽ, नाग के नचईहऽ,

आरे मोरे बाबू एह बाग के बचईहऽ.
दईंता पाताल के ले जात बाटे खाला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला,

राजा जी का राज में पड़ल बाटे पाला.
सउसे जिनिगिया विपतिये में कटल,

अणु बम छोड़े के बेचैन बाड़े पटल.
कहेले कि राम दोसर, दोसर हवे आला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
छम छम नाचेले मंहगिया बजार में,

नमरी के चीझुआ बेचात बा हजारमें.
कवन दो मुदईया लगावे मकड़जाला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
चुप रहऽ, चुप रहऽ, काल्हु भात खईब,

ढेर नधिअइब त मार लात खइब.
नेतवन के पूत मरे, कइलन स घोटाला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
परपी भगवनवा के आंखि बाटे फूटल,

हमनी के मूसरे से सीखले बा कूटल.
पछ करे पड़वन के पाके फूल माला,

चुप रहऽ, चुप रहऽ, आरे मोरे लाला.
दिनों दिन बढ़ता, जे काला धन खाला,
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कांट,
बक्सर - 802 112कविता
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

मगन किसान बाड़ें

कविता

मगन किसान बाड़ें


- शम्भु नाथ उपाध्याय



मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.

गदराइल मटर सरसो, तीसी चनवा फुलाइल,
रंग बिरंगा खेत देखिके,
खेतिहर बा अगराइल.
हंसेला किसानवां, सोचेला आपना मनवां,
असों नाहीं रही बड़की बंचिया कुंआरी,
मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.

चनवा दे दी साहू के करजा,
मटरा खाद के खरचा,
घरवाली के समुझाइब,
मति करिहे तू चरचा.
गेंहुआ खिआदी संउसे बराती,
तेल के खरचा सरसउवा सम्हारी,
मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.

जउवा सभ लरिकन के पाली,
दालि बनि लेतरी के,
बा अभाग, धनिआ का देखीहें
सपना देवपरी के ?
गुरवा बिकाई, पगरी रंगाई,
धनिया के बेसाहबी छापलिसारी,
मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.

बाछावा देके करबी निहोरा,
रुसल हित मनाईबि,
हं भगवान आस के पूरव..,
हम परसाद चढ़ाइबि.
पुरइबि सपनवां, चहकी अंगनवा,
डोलि चढ़ि जा दिन दुलहा अईहें दुआरी.
मगन किसान बाड़ें, हासिल निहारीं.
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तिखमपुर, बलिया - 277 001
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

बाटे क दिन के ई जिनिगी

 

कविता

बाटे क दिन के ई जिनिगी


- डा. बृजेन्द्र सिंह ‘बैरागी’


कशमीर से कन्याकुमारी तक हई देखीं,
होत बाटे पाप अपराध रोज जघन्य जी.
खात बाटे अदमी के अदमिये अब देखिं,
करताटे कुकरम धुआंधार ई अक्षम्य जी.

कहताटे शौक से सीना तानि अदिमी ई,
बा धरम ईमान सत्य प्रेम अब अमान्य जी.
जीओ चाहे मरो अब अदिमिअत भागि से,
प्रेम के पुजारी बाड़ न ईहवां नगण्य जी.

दिनों दिन बढ़त बाटे गिनति असुरवन के,
परंम के सजात बाटे चितवा असंख्य जी.
मान स्वाभिमान अब बचाईं लींजा हिन्द के,
परेम के जलाई जोति घर घर अनन्य जी.

परेम से रंगाइल रंग में बसेलन सुदामा कृष्ण,
नानक, कबीर, बुद्ध, सूर,तुलसी, चैतन्य जी.
पशु पक्षी पेंड़ अउर पहाड़ के सुनाम सुनीं,
होई जाई भारत वैकण्ु ठ धन्य धान्य जी.

शान्ति अहिंसा अउरी प्रेम के पढ़ाईं पाठ,
कशमीर से कन्याकुमारी तक एकरम्य जी.
कहेलन बैरागी विचार करीं भाई जी,
बाटे कई दिन के ई जिनिगी सुरम्य जी.
-------
आदर्श नगर, सागरपाली, बलिया- 277506
(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई दिसम्बर 2003  में अंजोर भइल रहल)

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

अयनक में

 कविता

अयनक में

- रामनिवास वर्मा ‘शिशिर’



अयनक में
ना देखे
आपन कोई चेहरा.
देखेला ओकर चेहरा
जे दिल में
बइठल रहेला .
ना सवांरे
आपन सूरत,
सवांरेला
ओकर सूरत,
जे दिल में
बइठल रहेला .
झेल लेला दरद,
भूल जाला गम,
ओकरा खातिर,
जे दिल में
बइठल रहेला .
तनहाई में जिनिगी
गुजार लेला,
भीड़ लेखा
ओकरे खातिर
जे दिल में
बइठल रहेला .
रो के हंस लेला,
खो के पा लेला,
मर के जी लेला,
ओकरे खातिर
जे दिल में
बइठल रहेला .
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ब्रहमपुर, बक्सर, पिन - 802112

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  नवम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

देवी गीत

 देवी गीत

- कृष्णा नन्द तिवारी

(उर्फ किशन गोरखपुरी)

माई शेरावाली क पूजिला चरनियां
कि सुति उठिना .
माई दीहितीं दरशनियां कि सुति उठिना,
हो कि सुति उठि ना ..
लालि रंग चुनरी आ नारियल चढ़ाईला.. .
माई के दुअरिया पे सिरवा झुकाइला ..
माई लेहड़ावली क धरीला शरनियां,
कि सुति उठिना .माई दीहितीं दरशनियां 0
धूप-अगरबतिया ले माई के देखाइला .
रउरे मंदिरवा में असरा लगाइला..
माई विन्ध्याचली जी के करीला भजनियां,
कि सुति उठिना. माई दीहितीं दरशनियां 0
नवरात्रि माई के पूजन जे करावेला .
मय पाप कटि जाला,
सुखी जीवन पावेला ..
गावेलन ‘किशन’ माई सगरी कहनियां,
कि घूमि-घूमिना .
माई दीहीती दरशनियां कि सुति उठिना,
हो कि सुति उठिना ..
----

कृष्णा नन्द तिवारी,
पुलिस चौकी, सतनी सराय, बलिया.कहानी
(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  नवम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)



झाह में जिनगी

 नयका कविता

झाह में जिनगी


- मलयार्जुन



शोर बा
मयना के मारण मंत्र क
डहर भुलाइल
लउर के हूरा
जूरा बान्हे
पर्स में राखत
मोबाइल
झीन
बीच बजरिया
देखा
बतियावत
केसे
जे पेंदी का हीन
बे पानी
कस ना मानी
नूर नुक्सा से गायब
कबले भौंह रंगाई
छेंकल बुढ़ापा राह
झाह में जिनगी
आग का खोरी
सुनी नु प्रलाप
के के रास्ता मिलल
फोफर.
---
मलयार्जुन,
वरिष्ठ मनोरंजन कर निरीक्षक, बलिया

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  नवम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

रविवार, 15 दिसंबर 2024

बारहमासा

कविता

बारहमासा

- सुरेश कांटक


 

करेजवा साले, ए मोर राजा,
बितल साले-साले ए मोर राजा.
रंग-राग ले ले के, तरसल फगुनवा
राजा बसंत सजल, धरती के धनवा
बिगड़ि गइल चाले, ए मोर राजा.

चईत महिनवा विरहवा सतावे
अलसल भोरवा के पुरवा चेतावे
भुलइलऽ कवना जाले, ए मोर राजा.

दंवरी-दंवात बइसाख दिन-रतिया
घमवा में बिगड़ेला सभके सुरतिया
हो गइनी बेहाले, ए मोर राजा.

जेठवा के लुकवा झंकोर देलस देहिया
नदी-नारा सुखल, दरार भइल नेहिया
पड़ल छाले छाले, ए मोर राजा.

उमसल असढ़वा बेहाल भइल हलिया
फिस-फुस घमवा, बेकल गांव गलिया
उड़ावऽ मत गाले, ए मोर राजा.

सावन के बदरा गरजि के डेरावे
बियवा डलाला, कजरिया ना भावे
देखावे रूप काले, ए मोर राजा.

भादो में कड़के आ बरिसे बदरिया
रोपनी आ नदी-नार भरल अहरिया
बजावे झिंगुर झोल, ए मोर राजा.

घमवा कुआरवा दशहरा ना भावे
रेंड़ा प धनवा आ धरती सुखावे
सपन हाथी पाले, ए मोर राजा.

कातिक में मुंह खोल ताकेला धनवा
फुलवा के असरे टंगाइल परनवा
झरेला ओस खाले, ए मोर राजा.

अगहन में कटिया आ गोलहथ सोहावे
ठंढी बयरिया जियरवा कंपावे
बजावऽ मत ताले, ए मोर राजा.

पुसवा के फुस दिन चइती बोआइल
जड़वा में जोड़ी बिना, मन घबड़ाइल
कमइया के खालें, ए मोर राजा.

माघ के टुसरवा पुअरवा ओढ़ावे
चलिया तोहार तनिको नाही भावे
भइल जीव के काले, ए मोर राजा.

अबहूं से आवऽ ना देखऽ सुरतिया
मोहले बिया तोहे कवन सवतिया
जइब नरक-नाले, ए मोर राजा.

कांटक चिरइंया उड़ी जब अकासे
धरती सरापी, रही ना कुछ पासे
रही काले काले, ए मोर राजा.
------

सुरेश कांटक,
कांट, ब्रह्मपुर, बक्सर, बिहार - 802 112

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  अक्टूबर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

मत कहऽ जिनगी बेमानी बा : दू गो गजल

 (1)

मत कहऽ जिनगी बेमानी बा


- शिवपूजन लाल विद्यार्थी

मत कहऽ जिन्दगी बेमानी बा,
खाली धूप-छांह के कहानी बा.
मायूस मत होखऽ मंजिल मिली,
भले सफर में कुछ परिसानी बा.

एह पीरा के सईंचि के रखऽ,
उनकर जुल्मों-सितम के निसानी बा.
ई जनतंत्र बस कहे भर के बा,
आजो केहू राजा, केहू रानी बा.

हमेसे फस्ले-बहार ना मिली,
जिन्दगी में आन्हियो-पानी बा.
समेस्या से कटि के जूझऽ लड़ऽ,
मुंह चोरावल त नादानी बा.

आजादी से केकरा का मिलल,
उनका छत त हमरा पलानी बा.
मत कहऽ जिन्दगी बेमानी बा,
खाली धूप-छांह के कहानी बा.

(2)


दिल के दरद कहां ले जांई

दिल के दरद कहां ले जाईंं,
व्याकुल मन कइसे बहलाईं ?
खुद अन्हार में भटकत बानी,
कइसे उनका राह दिखाईं ?

छल-फरेब के कांट बिछल बा,
कइसे आगा गोड़ बढ़ाईं ?
पत्थर के घर, पत्थर इन्सां,
बिरथा आपन लोर बहाईं.

बाहर-भीतर सगरो खतरा,
कहंवां भागीं, कहां लुकाईं ?
मानवता के खून करत बा,
जाति-धरम के निठुर कसाई.
---------
शिवपूजन लाल विद्यार्थी,
प्रकाशपुरी, आरा, भोजपुर

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  अक्टूबर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

बुधवार, 11 दिसंबर 2024

बवरिया अँचरा उड़ि-उड़ि जाला ना

 कजरी

बवरिया अँचरा उड़ि-उड़ि जाला ना

- त्रिभुवन प्रसाद सिंह ‘प्रीतम’



झुर-झुर बहे बयार,
बवरिया अँचरा उड़ि-उड़ि जाला ना.
उड़े चुनरिया अंगिया झलके,
फरके चढ़त जवानी, रामा,
पानी-पानी ऋतु मस्तानी,
निरखि उमिरि के पानी,
अरे रामा, हंसे नयन के कजरा,
बदरा झरि-झरि जाला ना.
झुर-झुर बहे बयार,
बवरिया अँचरा उड़ि-उड़ि जाला ना.

इरिखा भईल, सुरूज गरमइले,
होते सांझि जुड़इले, रामा,
छिपल चनरमा जाइ अन्हारा,
करिखा मुहें पोतइले,
अरे रामा झुक-झुक झांके तरई,
सुरति सहल न जाला ना.
झुर-झुर बहे बयार,
बवरिया अँचरा उड़ि-उड़ि जाला ना.

होते भोर, कुमुद मुसुकइली,
चढ़ते दिन कुम्हिलइली, रामा
कांच कली खिलला से पहिले,
लाल-पियर होइ गइली,
अरे रामा, लता लटकि रहि गइली,
उपर चढ़ल न जाला ना..
झुर-झुर बहे बयार,
बवरिया अँचरा उड़ि-उड़ि जाला ना.

चढ़ल झमकि सावन, मनभावन,
पतई पीटे ताली, रामा
थिरकि उठल बन मोर ताल पर,
झूमे डाली-डाली
अरे रामा बजल बीन बंसवरिया,
कजरी रोज सुनाला ना..
झुर-झुर बहे बयार,
बवरिया अँचरा उड़ि-उड़ि जाला ना.

खुलल केस, लट बिखरन लागे,
लहर-लहर लहराये, रामा
विस के मातलि जइसे नागिन,
बार-बार बलखाये,
अरे रामा सुधि उमड़ल, प्रियतम ठिग,
मनवा उड़ि-उड़ि जाला ना..
झुर-झुर बहे बयार,
बवरिया अँचरा उड़ि-उड़ि जाला ना.
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त्रिभुवन प्रसाद सिंह ‘प्रीतम’
शारदा सदन, कृष्णा नगर, बलिया- 277001

(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  सितम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

अँखिया के पुतरी

 कविता

अँखिया के पुतरी

- डॉ बृजेन्द्र सिंह बैरागी



बेटी हो दुलारी बारी, कइसे बिआह करीं ?
ई  दानव दहेज कहँवँ कब कइसन रूप धरी.

अदिमी के रूपवा में दानव दहेज देखऽ.
दया धरम, तियाग, क्षमा से परहेज देखऽ.
लीलें चाहे धियवन के ईहो रोज घरी-घरी.
बेटी हो दुलारी बारी.....

एही भ्रष्टासुरवा के राज बा समाज में
बहुरूपिया ई बोलेला बढ़ी के समाज में
सोना चांदी धन दउलत से ना पेट भरी.
बेटी हो दुलारी बारी....

सोचि-सोचि डर लागे कांपे हो करेजवा
लीली जाला तनिके में दानव दहेजवा
एकरे बा राज, के समाज के सुधार करी.
बेटी हो दुलारी बारी....

पोसि पालि बहुते जतन से सेयान कइनी
शक्ति रूप जानिके हम धीरज धियाज धइनी
बेटी तूं त हउ हमरो अंखिया के पुतली.
बेटी हो दुलारी बारी....

सोचिले सुनर वर से बिआह कई दीहींतीं
भलहीं हो बिकाइ बरबाद होई जईतीं
बाकी स्टोपवा अउर गैसवा के का करीं.
बेटी हो दुलारी बारी....
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डॉ बृजेन्द्र सिंह बैरागी
आदर्श नगर, सागरपाली, बलिया - 277506
 (भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  सितम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)
 

मंगलवार, 10 दिसंबर 2024

भोजपुरी कविता में वियोग

आलेख

 भोजपुरी कविता में वियोग


 - भगवती प्रसाद द्विवेदी


 ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा  गान’ के मुताबिक कविता रचेवाला पहिलका कवि वियोगी रहल होइहन आ उन्हुकरा आंतर के बेसम्हार पीर के आह-कराह से कविता के जनम भइल होई. ओइसहूं,  साहित्य में जवन कुछ शाश्वत बा, अमर बा, ओकर अधिकतर हिस्सा करूने से लबालब भरल बा. सांच पूछल जाउ त आमजन के जिनिगी के कथा दुःखे आ वियोग-बिछोह से सउनाइल बा आ रचनिहार किछु आप बीती, किछु जगबीती से घवाहिल होके अंतर्मन के पीर के बानी देला. तबे उ मरम के छूवेवाली  रचना बनेले आ अपना गहिर-गझिन संवेदना से पढ़निहार-सुननिहार पर आपन अमिट छाप छोड़ेलें. चाहे हीर-रांझा होखसु, लैला-मजनूं होखसु भा सोहनी-महिवाल. कठकरेजी समाज एह लोग के कबो मिलन ना होखे दिहल, बाकिर एह चरित्रन के अमर प्रेम आ वियोग-बिछोह के दिल दहलावे वाली कथा जन-जन के जबान पर आजुओ बा.


भोजपुरिया समाज अपना बल-बूता पर जांगर ठेठा के बहुत किछु हासिल करेवाला समाज रहल बा. रोजी-रोटी के जोगाड़ में आम तौर पर मरद लोग बहरवांसू हो जात रहे  आ घर-परिवार, गांव-जवार आ पत्नी-प्रेमिका  के वियोग ताजिनिगी झेले खातिर अलचार रहे. कमोबेस इहे हाल आजुओ बा आ नगर-महानगरन में छिछियात भोजपुरिया दुख-तकलीफ आ बिछोह के अपना आंतर में दबवले जीवटता के जियतार नमूना पेश करि रहल बाड़न.


भोजपुरी के लोकगीतन में त  वियोग-बिछोह के अइसन मार्मिक, हृदयस्पर्शी  चित्र उकेराइल बा कि सुननिहार के करेजा फाटे  लागेला आ आंख से लोर के नदी बहे  लागेले. ई वियोग खाली मरद मेहरारू आ प्रेमी  प्रेमिका के बिछुड़ले भर सीमित नइखे. एकर फइलाव कबो ससुरा जात बेटी के वियोग का रूप में बियाहगीत में त कबो दुनिया जहान से नाता तूरत परिजन के बिछोह का रूप में  मउवत गीतो में मिली. भोजपुरी के आदिकवि  कबीर अपना निरगुनिया बानी में जीव आ  आतमा के बिछोह के रेघरियावे वाला चित्र
 उकेरले बानीं. महेन्दर मिसिर के पूरबी में  आंवक में ना आवेवाला वियोग के दरद के  बखूबी महसूसल जा सकेला. बारहमासा में त  हर ऋतु के मौसमी सुघरता का संगे बिरह में बेयाकुल नायिका के मनोदशा के तस्वीर आंतर  के तीर-अस बेधे बेगर ना रहि सके. हर  जगहा इहे भाव - ‘पिया के वियोगवा में कुहुके  करेजवा’. चाहे फागुन के फगुवा होखे, चइत  के चइता होखे भा सावन के कजरी. अगर  साजन-सजनी के साथ ना होखे त सुहावन  मउसम के भकसावन लागत देरी ना लागे. तबे  नू विरहिनी के आंख से लोर, मघा नछत्तर के  बरखा मे ओरियानी के पानी अस टपकेला.


 महाकवि जायसी लिखले बानी :

बरिसे मघा झकोरि-झकोरि
 मोर दुइ नैन चुअत जस ओरी.

राम सकल पाठक ‘द्विजराम’ रचित ‘सुन्दरी-विलाप’ के सुन्दरी के विलाप पथलो  दिल इंसान के पघिलावे के ताकत राखत बा :

गवना कराइ सईंया घरे बइठवले से,
अपने गइले परदेस रे बिदेसिया.
चढ़ली जवनिया बैरिन भइली हमरी से,
केई मोरा हरिहें कलेस रे बिदेसिया.
अमकि के चढ़ीं रामा अपना अटरिया से,
चारू ओर चितईं चिहाइ रे बिदेसिया.
कतहूं ना देखीं रामा सईंया के सुरतिया से,
जियरा गइल मुरझाइ रे बिदेसिया.


लोक जिनिगी के कुशल चितेरा भिखारी ठाकुर के अमरकृति ‘बिदेसिया’ त बिदेसी आ  सुन्दरी के विरहे-वियोग के केन्द्र में राखिके  रचल गइल बा. जब बिदेसी अचके में परदेस चलि जात बाड़न, त सुन्दरी भाव-विह्वल होके  कहत बाड़ी :

पियवा गइलन कलकातवा ए सजनी !
तरि दिहलन पति-पत्नी नातवा ए सजनी,
किरिन-भीतरे परातवा ए सजनी!

विरहिनी बेचारी जल बिन मछली नियर तड़पत बाड़ी. आखिर हमरा जरी मेे के आरी  भिड़ा देले बा? रोज आठो पहर बाट जोहे के  सिलसिला का कबो खतम होई ?

बीतत बाटे आठ पहरिया हो
डहरिया जोहत ना.
धोती पटधरिया धइके, कान्हवा प चदरिया हो,
बबरिया झारिके ना.
होइब कवना शहरिया हो
बबरिया झारि के ना.
केइ हमरा जरिया में भिरवले बाटे अरिया हो,
चकरिया दरिके ना.
दुख में होत बा जतसरिया हो,
चकरिया दरिके ना.
परोसिकर थरिया, दाल-भात-तरकरिया हो,
लहरिया उठे ना,
रहित करित जेवनरिया हो,
लहरिया उठे ना.

आधुनिक भोजपुरी कवितो में एह पक्ष के मर्मांतक पीर का संगे रचनाकार लोग उठावत आइल बा. अपना घर में रहेवाली अकेल  मेहरारू आ टोल-परोस के मरदन के भुखाइल  बाघ-अस नजर. दिन भर त काम-धाम में  लवसान होके कटियो जाला, बाकिर पहाड़-अस  रात काटल मुश्किल होला. आचार्य पाण्डेय  कपिल के शब्दन में :

कइसे मनवा के बतिया बताईं सखी,
हाल आपन कहां ले सुनाईं सखी.
दिन त कट जाला दुनिया के जंजाल में,
रात कइसे अकेले बिताईं सखी.

सावन के रिमझिम फुहार, झींसी आ  हरियरी, उहवें परदेसी बालम के वियोग. डॉ रिपुसूदन श्रीवास्तव के एगो गीत में विरही मन में पइसल हूक के अन्दाज लगावल जा सकेला :

असो आइल फेरू सावन के बहार सजनी,
जब से परे लागल रिमझिम फुहार सजनी!
ठाढ़ दुआरी राधा भींजे, कान्हा घर नाआइल,
उमड़ि-घुमड़ि घन शोर मचावे,
हिय में हूक समाइल
बिजुरी धरे लागल जरला पर अंगार सजनी.
टप-टप-टप-टप मड़ई चूवे,
नींद भइल बैरिनिया,
बलमा गइल विदेस छोड़िके,
कलो बारी धनियां
नइया परल बाटे बीचे मंझधार सजनी.

आज काल्ह जब बाजारवाद नेह नाता के मिठास लीलत जा रहल बा, जिनिगी कतना अकसरुवा, दुख-पीर के पर्याय बनल जा रहल  बिया. बेसम्हार भीड़ो का बीच कई कई गो मोरचा पर लड़त-भीड़त, पछाड़ खात आ टूटत जात बिरही मन. शिवकुमार ‘पराग’ के कहनाम बा :

आह-वाह जिनिगी में बा,
धूप-छांह जिनिगी में बा.
सूनत करेजा फाटेला,
उ कराह जिनिगी में बा.
जब चारू ओर जुलुमी जन के ताण्डव होई
त जिनिगी पहाड़े नू बनि के रहि जाई.

कविवर जगदीश ओझा ‘सुन्दर’ के पाती देखी :

कुकुर भइले जुल्मी जन, हाड़ भइल जिनिगी
नदी भइल नैना, पहाड़ भइल जिनिगी.

अभाव आ विरह के बाथा-कथा प्रभुनाथ मिश्र बयान कइले बानीं :

सनन-सनन जब बहेले बेयरिया
टटिया के ओटवो उड़ावेले चुनरिया
कांपि जाले पतई से पाटल पलान रे
बदरा के देखि-देखि बिहरे परान रे!

धनिया लाख चाहत बाड़ी, बाकिर होरी के  सुधि बिसरते नइखे. पिया के मिठकी नजरिया  पर दीठि-कनखी मारत डॉ अशोक द्विवेदी  कहत बाड़न :

अंगना-बंड़ेरिया प कगवो ना उचरे
पिया तोर मिठकी नजरिया ना बिसरे.
डाढ़ि-डाढ़ि फुदुकेले रूखी अस दिन भर
मन के चएन नाहीं देले कबो छिन भर
सुधिया तोहार मोरा हियरा के कुतरे.

आखिरकार परदेसी के पाती पाके धनिया क हुलास-उछाह के पारावार नइखे. अनन्त  प्रसाद ‘राम भरोसे’ के पाती भरपूर भरोसा  दियावत बिया :

चिट्ठि में लिखले बाड़न कि
फगुआ ले हम आइब.
तब तक ले पगार पा जाइब,
बोनस भी पा जाइब.
चिन्ता के कुल्हि छंटल बदरिया,
चिट्ठी आइ गइल बा.
मन उड़िके जा पहुंचल झरिया,
चिट्ठी आइ गइल बा.


कुल्हि मिला के भोजपुरी कविता में वियोग के जवन चित्र उकेरल गइल बा, उ बड़ा जियतार बा आ ओह में मउसम का मिजाज का संगे नारी-मन के सोच, आकुलता,
 तड़प आ अभाव ग्रस्त बेबसी के हर दृष्टि से  मन के छूवे वाला चित्रण भइल बा, जवन  भोजपुरी काव्य के उठान आउर ताकत के  परिचायक बा.
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भगवती प्रसाद द्विवेदी
द्वारा, प्रधान महाप्रबन्धक, दूरसंचार जिला,
पोस्ट बाक्स 115, पटना-800001 -बिहार

( भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर  सितम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)